नारी डेस्क : आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में नींद की समस्या आम होती जा रही है। करियर का दबाव, पारिवारिक तनाव, मोबाइल–लैपटॉप की स्क्रीन, अनियमित दिनचर्या और गलत खानपान ये सब मिलकर नींद को प्रभावित करते हैं। जब रात-भर नींद नहीं आती, तो कई लोग तुरंत नींद की गोलियों का सहारा ले लेते हैं। शुरुआत में राहत मिलती है, लेकिन लंबे समय तक इस्तेमाल से ये दवाएं आदत (एडिक्शन) में बदल सकती हैं। आखिर ऐसा क्यों होता है?
दिमाग की केमिस्ट्री में बदलाव करती हैं नींद की गोलियां
डॉक्टरों द्वारा दी जाने वाली कई स्लीपिंग पिल्स (जैसे Benzodiazepines और Z-ड्रग्स) दिमाग में मौजूद GABA नाम के न्यूरोट्रांसमीटर का असर बढ़ा देती हैं। GABA दिमाग की गतिविधि को शांत करता है। इससे बेचैनी कम होती है और नींद जल्दी आती है। लेकिन जब बाहर से बार-बार GABA का असर बढ़ाया जाता है, तो दिमाग धीरे-धीरे खुद से नींद लाने की क्षमता खोने लगता है।

टॉलरेंस (Tolerance): वही असर पाने के लिए बढ़ानी पड़ती है डोज
शुरुआत में कम मात्रा की नींद की गोली लेने से आसानी से नींद आ जाती है, लेकिन लगातार इस्तेमाल करने पर शरीर उस दवा का आदी हो जाता है। इस स्थिति को टॉलरेंस कहा जाता है। टॉलरेंस बढ़ने पर वही असर पाने के लिए दवा की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ानी पड़ती है। यानी जिस डोज से पहले नींद आ जाती थी, वही डोज कुछ समय बाद बेअसर लगने लगती है। इसी बढ़ती हुई जरूरत से लत की शुरुआत होती है और व्यक्ति बिना दवा के सो नहीं पाता।
डिपेंडेंस (Dependence): दवा बंद करते ही बढ़ जाती है परेशानी
अगर कोई व्यक्ति लंबे समय तक नींद की गोलियां लेता रहे और फिर उन्हें अचानक बंद कर दे, तो शरीर और दिमाग दोनों इसकी प्रतिक्रिया देने लगते हैं। ऐसी स्थिति में तेज़ अनिद्रा, घबराहट, चिड़चिड़ापन, बेचैनी, पसीना आना और कभी-कभी हाथ-पैर कांपने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। दरअसल शरीर इन दवाओं का आदी हो जाता है और उनके बिना सामान्य रूप से काम नहीं कर पाता। इसी हालत को शारीरिक और मानसिक निर्भरता (Dependence) कहा जाता है, जो लत का एक गंभीर संकेत होती है।

रिवॉर्ड सिस्टम (Reward system) को भी प्रभावित करती हैं कुछ दवाएं
कुछ दवाएं जैसे Alprazolam केवल नींद ही नहीं बल्कि एंज़ायटी के इलाज में भी दी जाती हैं। ये दवाएं दिमाग के रिवॉर्ड सिस्टम को प्रभावित करती हैं, जिससे दवा लेने के बाद मिलने वाला आराम और सुकून दिमाग को एक सकारात्मक अनुभव के रूप में महसूस होता है। धीरे-धीरे दिमाग उस अनुभव को दोहराना चाहता है और व्यक्ति हल्की टेंशन, बेचैनी या मामूली नींद की समस्या में भी गोली लेने लगता है। इसी प्रक्रिया से मनोवैज्ञानिक लत विकसित हो जाती है, जिसमें व्यक्ति दवा पर भावनात्मक रूप से निर्भर हो जाता है।
हर स्लीपिंग पिल एक-सी खतरनाक नहीं होती
एक्सपर्ट्स का मानना है कि सभी नींद की गोलियां समान रूप से खतरनाक या लत लगाने वाली नहीं होतीं। उदाहरण के तौर पर Melatonin आधारित सप्लीमेंट्स को अपेक्षाकृत कम जोखिम वाला माना जाता है, क्योंकि ये शरीर में प्राकृतिक रूप से बनने वाले मेलाटोनिन हार्मोन की नकल करते हैं और नींद के चक्र को संतुलित करने में मदद करते हैं। हालांकि ये दवाएं ओवर-द-काउंटर आसानी से मिल जाती हैं, लेकिन इन्हें भी लंबे समय तक बिना डॉक्टर की सलाह के लेना सही नहीं है, क्योंकि गलत या अनावश्यक उपयोग से नींद से जुड़ी समस्याएं बढ़ सकती हैं।

ध्यान देनेम वाली बातें
नींद की गोलियां हमेशा सीमित समय के लिए लें
खुद से डोज न बढ़ाएं
नींद सुधारने के लिए लाइफस्टाइल में बदलाव करें।
सोने-जागने का समय तय करें
रात में स्क्रीन टाइम कम करें
कैफीन और देर रात के खाने से बचें
रिलैक्सेशन और मेडिटेशन अपनाएं।
नींद की गोलियां तात्कालिक राहत दे सकती हैं, लेकिन लंबे समय तक इनका सेवन दिमाग को आलसी बना देता है और लत का खतरा बढ़ा देता है। बेहतर यही है कि नींद की समस्या की जड़ को समझें और डॉक्टर की सलाह से ही इलाज कराएं।