नारी डेस्क : आज की बदलती लाइफस्टाइल का असर हमारी सेहत पर भी पड़ता है। खासकर उन लोगों के लिए जो हाई ब्लड प्रेशर (Hypertension) जैसी समस्या से जूझ रहे हैं। आमतौर पर उन्हें रोज़ दवा लेनी पड़ती है, लेकिन दवा न लेने से कभी-कभी तेज सिरदर्द, चक्कर, नाक से खून आना, धुंधला दिखना, छाती में दर्द या सांस लेने में तकलीफ जैसी परेशानियां भी हो सकती हैं। जानकारी के मुताबिक, हाइपरटेंशन को अक्सर “साइलेंट किलर” कहा जाता है, क्योंकि यह बिना लक्षण दिखाए हार्ट अटैक, स्ट्रोक और किडनी की गंभीर समस्याओं का कारण बन सकता है। दशकों से इसका इलाज मुख्य रूप से रोज़ाना ली जाने वाली गोलियों पर निर्भर रहा है। लेकिन अब मेडिकल जर्नल The Lancet में प्रकाशित एक नई समीक्षा ने नई उम्मीद जगाई है। भविष्य में मरीजों को रोज़ाना दवा लेने की जरूरत नहीं होगी, बल्कि साल में सिर्फ दो इंजेक्शन लेने से ही ब्लड प्रेशर को प्रभावी ढंग से कंट्रोल किया जा सकेगा।
नई थेरेपी कैसे काम करती है?
सबसे आगे चल रही दवा जिलेबेसिरन है, जिसे Roche और Alnylam Pharmaceuticals ने मिलकर विकसित किया है।
यह दवा siRNA तकनीक का इस्तेमाल करती है।
यह लिवर में बनने वाले angiotensinogen प्रोटीन को दबाती है, जो ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने में मुख्य भूमिका निभाता है।
एक सबक्यूटेनियस (त्वचा के नीचे) इंजेक्शन 6 महीने तक ब्लड प्रेशर कम रखने में सक्षम पाया गया है।
यह फिलहाल फेज-3 ट्रायल में है।
इसी तरह, Novo Nordisk की दवा Ziltivekimab हृदय रोग के जोखिम से जुड़ी सूजन प्रक्रियाओं को निशाना बनाती है। कुछ अन्य शोध Aldosterone हार्मोन के नियंत्रण पर काम कर रहे हैं, जो शरीर में नमक और पानी के संतुलन को प्रभावित करते हैं।

क्या इंजेक्शन सुरक्षित और किफायती होगा?
शुरुआती ट्रायल में इन इंजेक्शनों की सुरक्षा संतोषजनक पाई गई है। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि हाइपरटेंशन (Hypertension) जीवनभर रहने वाली बीमारी है। इसलिए लंबे समय तक असर और बड़े पैमाने पर सुरक्षा डेटा की जरूरत होगी। लागत भी एक चुनौती है। लंबी अवधि तक असर करने वाली दवाएं अक्सर महंगी होती हैं। खासकर कम और मध्यम आय वाले देशों में इसकी उपलब्धता और कीमत एक बड़ा सवाल है।
डॉक्टरों की राय
कार्डियोलॉजिस्ट डॉक्टर का कहना है, ये दवाएं केवल ब्लड प्रेशर कम करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बीमारी के मूल कारण को निशाना बनाती हैं। अगर लंबे समय का डेटा सकारात्मक रहा, तो साल में सिर्फ दो बार इंजेक्शन लेना व्यावहारिक विकल्प बन सकता है। वे आगे कहते हैं कि रोज़ाना दवा लेना भूल जाना हाइपरटेंशन (Hypertension) कंट्रोल में सबसे बड़ी बाधा है। इंजेक्शन थेरेपी इस समस्या को काफी हद तक हल कर सकती है।

क्यों रोज़ की गोलियां कम पड़ती हैं?
मरीजों को ACE इन्हिबिटर्स, एंजियोटेंसिन रिसेप्टर ब्लॉकर्स, कैल्शियम चैनल ब्लॉकर्स और डाययूरेटिक्स जैसी दवाओं का कॉम्बिनेशन दिया जाता है। हालांकि ये प्रभावी हैं, लेकिन मरीज अक्सर डायबिटीज, मोटापा और कोलेस्ट्रॉल जैसी कई समस्याओं से जूझते हैं। कई दवाओं का एक साथ सेवन करने से पिल फटीग (दवाओं से थकान) और साइड इफेक्ट्स बढ़ सकते हैं। यही वह समस्या है, जिसे लंबी अवधि के इंजेक्शन हल कर सकते हैं।
हाइपरटेंशन का आंकड़ा
दुनिया में: 140/90 mm Hg या उससे ज्यादा ब्लड प्रेशर को हाइपरटेंशन माना जाता है। 1.4 अरब से अधिक लोग इससे प्रभावित हैं, और लगभग 44% लोगों को पता ही नहीं है कि उन्हें यह बीमारी है।
भारत में: ICMR-INDIAB 2023 के अनुसार, 31.5 करोड़ से अधिक लोग हाइपरटेंशन से ग्रस्त हैं। निदान के बाद भी केवल एक छोटा हिस्सा ही ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रख पाता है।

साल में दो इंजेक्शन वाली नई थेरेपी अभी टेस्ट के दौर में है। अगर यह सुरक्षित और प्रभावी साबित होती है, तो हाइपरटेंशन के इलाज में क्रांतिकारी बदलाव संभव है। यह न केवल रोज़ाना दवा लेने की झंझट कम करेगी, बल्कि दिल के दौरे और स्ट्रोक के खतरे को भी घटाएगी।