नारी डेस्क : कश्मीरी पश्मीना शॉल सिर्फ गर्म रखने के लिए नहीं, बल्कि शाही कला और बारीकी की मिसाल भी मानी जाती है। यह शॉल इतनी कीमती होती है कि इसकी कीमत लाखों रुपये में भी हो सकती है। यह कीमत शॉल पर की गई बारीक कढ़ाई और कारीगरी के आधार पर तय होती है। पीएम नरेंद्र मोदी से लेकर बॉलीवुड सितारे तक इस शॉल को अपने कंधों पर ओढ़ते नजर आए हैं। खास बात यह है कि कानी शॉल पर लकड़ी की छोटी सुइयों (कनिस) से एम्ब्रॉयडरी की जाती है, और यह एम्ब्रॉयडरी इतनी जटिल होती है कि इसे बनाने के लिए एक दिन में सिर्फ 1–2 सेंटीमीटर ही तैयार हो पाती है।
पीएम मोदी की पसंदीदा शॉल
पीएम मोदी को केवल कश्मीर की खूबसूरत वादियां ही नहीं, बल्कि यहां की पारंपरिक रंग-बिरंगी शॉलें भी बेहद पसंद हैं। इनमें सबसे खास है कानी पश्मीना शॉल, जिसे वह कई बार सार्वजनिक कार्यक्रमों में अपने कंधों पर ओढ़ते दिख चुके हैं।

कानी शॉल का इतिहास: मुगल काल से जुड़ा
कानी शॉल का इतिहास मुगल काल तक माना जाता है। यह कला 15वीं शताब्दी में फारसी और तुर्की बुनकरों द्वारा कश्मीर लाई गई थी। धीरे-धीरे यह शॉल राजा-महाराजाओं की शान बन गई और आज कश्मीर की सबसे कीमती हस्तकलाओं में गिनी जाती है।
कानी का मतलब और बनावट
कानी शॉल पश्मीना ऊन से बनाई जाती है। इसे बनाने के लिए लकड़ी की छोटी सलाइयों का उपयोग किया जाता है, जिन्हें कश्मीरी में ‘कानी’ कहा जाता है। इन लकड़ी की सुइयों को कनिस कहा जाता है। कनिस के चारों ओर रंगीन धागे लपेटकर शॉल पर जटिल और खूबसूरत पैटर्न बनाए जाते हैं। कनिस आमतौर पर पूस तुल नामक जंगली लकड़ी से बने होते हैं, जिससे बुनाई में मजबूती और बारीकी आती है।
कानी शॉल इतनी महंगी क्यों है?
कानी पश्मीना शॉल तैयार करना बेहद मेहनत और धैर्य का काम है। एक शॉल को बनने में 3–4 साल लग सकते हैं। इसे बनाने में 3–4 कुशल कारीगर लगते हैं। रोज़ाना 6–7 घंटे काम किया जाता है। एक दिन में केवल 1–2 सेंटीमीटर बुनाई हो पाती है। इतनी मेहनत और समय के कारण यह शॉल कीमती और अनमोल मानी जाती है।

कानी शॉल की खासियत
बुनाई काफी हद तक कालीन बुनाई जैसी होती है। इस्तेमाल होने वाली ऊन लद्दाख की हाई-ग्रेड कश्मीरी पश्मीना होती है। डिजाइन को सीधे शॉल पर नहीं बनाया जाता, बल्कि कोडेड भाषा ‘तालिम’ में तैयार किया जाता है। मास्टर बुनकर तालिमगुरु ग्राफ पेपर पर पैटर्न बनाते हैं, जिसे देखकर कारीगर बुनाई करते हैं। यह शॉल हल्की, ठंड से सुरक्षा देने वाली और स्वेटर की जरूरत नहीं पड़ने वाली होती है।
कानी शॉल पर बनने वाले फेमस कश्मीरी डिजाइन
कानी शॉल में दुनिया के सबसे पतले रेशमी धागे का इस्तेमाल होता है। इसकी बारीक कढ़ाई और रंगों के कारण यह शॉल किसी पेंटिंग जैसी लगती है। मुख्य डिजाइन इस प्रकार हैं। मोर (Peacock) डिजाइन, फूलों की बारीक कढ़ाई, फ्लोरल पैटर्न और राजा-महाराजाओं के महल जैसी शाही डिज़ाइन। शॉल का वजन 150–180 ग्राम के बीच होता है। बारीक काम की वजह से कारीगर एक बार में केवल 2 घंटे से ज्यादा काम नहीं कर पाते।

कानी शॉल की देखभाल कैसे करें
डिटर्जेंट पाउडर का उपयोग न करें।
हल्के लिक्विड वॉश या इजी वॉश का इस्तेमाल करें।
दाग हटाने के लिए गुनगुने पानी में रातभर भिगोकर रखें।
धोने के बाद शॉल को धूप में नहीं, छांव में सुखाएं।
इस तरह इसकी रंगत और नरम बुनाई लंबे समय तक बनी रहती है।
कानी पश्मीना शॉल की कीमत
कानी शॉल की कीमत इसकी कारीगरी, डिजाइन और बुनाई पर निर्भर करती है।
कीमत आमतौर पर 13,000 रुपये से शुरू होकर 1 लाख रुपये या उससे अधिक तक हो सकती है।