
नारी डेस्क : उत्तर प्रदेश के वृंदावन स्थित बांके बिहारी मंदिर की परंपराएं पूरे भारत में सबसे अलग और भावनात्मक मानी जाती हैं। देश के लगभग हर मंदिर में आरती के समय घंटी बजती है, लेकिन बांके बिहारी मंदिर में यह परंपरा नहीं निभाई जाती। इसके पीछे न तो कोई शास्त्रीय नियम है और न ही कठोर विधि बल्कि इसकी जड़ें गहरे प्रेम भाव में हैं।
देवता नहीं, लाला के रूप में पूजा
वृंदावन में भगवान श्रीकृष्ण को देवता नहीं, बल्कि लाला (छोटा बच्चा) मानकर पूजा जाता है। यहां भक्ति का आधार नियम नहीं, बल्कि अपनापन है। इसी सोच के कारण पूजा-पाठ की हर क्रिया बच्चे की भावनाओं के अनुरूप की जाती है।

इंद्रेश महाराज ने बताया कारण
वृंदावन के प्रसिद्ध कथावाचक इंद्रेश महाराज के अनुसार, बांके बिहारी जी को जगाया नहीं जाता, बल्कि उनसे प्यार से निवेदन किया जाता है। लाला उठो… जय हो लाला की। यही कारण है कि जहां अन्य मंदिरों में भगवान ब्रह्म मुहूर्त में जागते हैं, वहीं बांके बिहारी जी लगभग सुबह 8 बजे दर्शन देते हैं। मान्यता है कि जैसे छोटे बच्चे देर से सोते और देर से उठते हैं, वैसे ही लाला भी।
घंटी क्यों नहीं बजती?
इंद्रेश महाराज बताते हैं कि घंटी की तेज आवाज से लाला डर सकते हैं। अगर भगवान को डर लगे, तो यह प्रेम में कमी मानी जाती है। इसलिए आरती के समय घंटी नहीं बजाई जाती, बल्कि मृदुल स्वर में भजन और कीर्तन किया जाता है। यही वजह है कि बांके बिहारी मंदिर दुनिया का शायद इकलौता मंदिर है, जहां आरती बिना घंटियों के होती है।

वृंदावन की दिनचर्या भी है प्रेम से भरी
दोपहर में मंदिर बंद हो जाते हैं, क्योंकि मान्यता है कि ठाकुर जी गो-चरण के लिए गए हैं। शाम को लौटने पर सबसे पहले उनके गालों और हाथों पर इत्र लगाया जाता है, जैसे कोई मां अपने बच्चे को संवारती है।
विधि नहीं, भावना है पूजा का आधार
वृंदावन में धर्म से ज्यादा प्रेम को महत्व दिया जाता है। यहां भगवान की पूजा विधि आधारित नहीं, बल्कि भावना से भरी होती है। उनकी नींद, डर, खुशी सब कुछ मानवीय भावनाओं के अनुरूप माना जाता है।