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Inspiring Story: गरीबों में दान कर सके पैसे इसलिए हफ्ते में 1 दिन खेती करती हैं यह सरकारी महिला अफसर

  • Edited By Anjali Rajput,
  • Updated: 06 Oct, 2020 09:04 AM
Inspiring Story: गरीबों में दान कर सके पैसे इसलिए हफ्ते में 1 दिन खेती करती हैं यह सरकारी महिला अफसर

भारत में जब भी बात सरकारी अफसर की जाती हैं तो मन में पहला ख्याल भ्रष्टाचार का आता है। मगर, एक ऐसी सरकारी महिला अफसर भी है जो गरीबों के लिए खुद खेतों में मजदूरी करती है। हम बात कर रहे हैं तेलंगाना, मुलुगु के जयशंकर भूपलपल्ली जिले की रहने वाली 34 साल की तस्लीमा मोहम्मद की, जो गरीबों और जरूरतमंदों के लिए मसीहा बन गई है।

गरीबों के लिए करती हैं खेती

तस्लीमा जिले में सब-रजिस्ट्रार का काम करती हैं। उनका काम जिले के दायित्व संपत्ति के रिकॉर्ड और टैक्स का ख्याल रखना है। मगर, इसके साथ ही उन्हें खुशी मिलती है गरीब और जरूरतमंदों की मदद से। वह खेतों में काम करती है, जिससे उन्हें हफ्ते में 250-300 रुपए कमा लेती हैं। मगर, इन पैसों का इस्तेमाल वह जिले की समस्याओं को सुलझाने और किसानों की मदद के लिए करती हैं।

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किसानों को करती है जागरूक

तस्लीमा की चिंता का सबसे बड़ा कारण तेलंगाना, आंध्र  प्रदेश और छत्तीसगढ़ में रहने वाली संसाधन विहीन गुट्टी कोया जनजाति का उत्थान है। तस्लीमा का कहना है कि इस जिले में खेती-किसान का महत्वपूर्ण स्थान है। वह पिछले 6 सालों से हर हफ्ते के आखिरी दिन खेत में काम कर रही हैं। इसके साथ ही वह किसानों को सरकारी योजनाओं के बारे में जागरूक करती रहती हैं।

नकसलियों के हाथों हुई पिता की मौत

उन्हें यह प्ररेणा उनके पिता के साथ हुई एक घटना से मिली। दरअसल, उनके पिता नकसलियों के हाथों मारे गए थे। पिता की मौत के बाद उनकी मां ने घर की जिम्मेदारी संभाली और 5 एकड़ जमीन पर खेती शुरू की लेकिन आर्थिक तंगी के चलते उनकी जमीन बिक गई। मगर, उनकी मां ने खेती नहीं छोड़ी, जिसने उन्हें जिंदा भी रखा।

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मां के संघर्ष से बनी अफसर बिटीया

आर्थिक तंगी के चलते तस्लीमा की मां को उनकी पढ़ाई के लिए भी काफी मेहनत करनी पड़ी। सरकारी परीक्षा की कोचिंग के लिए 13,000 रु फीस देनी होती थी, जिसके लिए उनकी मां कड़ा संघर्ष करती थी। तस्लीम का कहना है कि जब भी मैं किसी गरीब को देखती हूं तो मुझे अपनी मां की तकलीफें याद आ जाती हैं।

मदद से मिलती है तस्लीमा को खुशी

किसानों और जरूरतमंदों की मदद के लिए अलावा तस्लीमा गमशुदा बच्चों को उनके घर तक पहुंचाने का काम भी करती है। यही नहीं, तस्लीम ने एक 15 साल की बच्ची की जिम्मेदारी भी अपने कंधों पर ली, जिसने दुर्घटना के कारण अपने माता-पिता को खो दिया। वह अब तक 17 बच्चों को नई जिंदगी दे चुकी हैं। साथ ही लॉकडाउन के दौरान 300 से अधिक स्टूडेंट्स और युवा पेशेवरों को खेती करने के लिए प्रेरित किया, ताकि वो अपने परिवार की मदद कर सकें। समाज सेवा में तस्लीम की आधी कमाई खर्च हो जाती है लेकिन इससे उन्हें खुशी मिलती है।

फेसबुक पर हजारों फॉलोअर्स

उनके इस सहारनीय कार्यों के लिए तस्लीमा को 'गुट्टी कोयला पेड्डका' (गुट्टा कोया जनजातियों की बहन) कहा जाता है। फेसबुक पर उनके नाम से 'सब-रजिस्ट्रार तस्लीमा फॉलोअर्स ' पेज है, जो दूसरों की मदद के लिए बनाया गया है। इसे 1,500 से अधिक लोग फॉलो कर रहे हैं।

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