
नारी डेस्क : डॉक्टरों के कुछ शब्द किसी परिवार की पूरी ज़िंदगी बदल सकते हैं। जब एक मां से कहा गया कि उसकी बेटी “कांच की गुड़िया” है, तो यह वाक्य किसी भी मां को अंदर से तोड़ सकता था। लेकिन इस मां ने हार नहीं मानी। उसने डर को ताकत में बदला और अपनी बेटी के लिए एक नई दुनिया रच दी। बता दें की 29 वर्षीय गिरिजा एक दुर्लभ बीमारी ऑस्टियोजेनेसिस इम्परफेक्टा ((Osteogenesis Imperfecta - OI)) से पीड़ित हैं। यह एक आनुवंशिक बीमारी है, जिसमें हड्डियां बेहद कमजोर हो जाती हैं और मामूली झटके से भी टूट सकती हैं। इसी कारण गिरिजा न ठीक से चल पाती हैं और न ही सामान्य तरीके से बैठ सकती हैं।
क्या है ऑस्टियोजेनेसिस इम्परफेक्टा?
ऑस्टियोजेनेसिस इम्परफेक्टा (Osteogenesis Imperfecta - OI) को आम भाषा में ‘ब्रिटल बोन डिजीज’ कहा जाता है। इस बीमारी में शरीर में कोलेजन की कमी या खराब गुणवत्ता के कारण हड्डियां मजबूत नहीं बन पातीं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह बीमारी जन्म से होती है और इसका पूरी तरह इलाज फिलहाल संभव नहीं है, लेकिन सही देखभाल से जीवन को बेहतर बनाया जा सकता है।

यह कैसे होता है?
इस रोग का कारण कोलाजेन नामक प्रोटीन में गड़बड़ी होती है।
कोलाजेन हड्डियों को मजबूती और लचीलापन देने का काम करता है।
जब कोलाजेन सही तरीके से नहीं बनता, तो हड्डियां कमजोर और भंगुर (fragile) हो जाती हैं।
यह जीन में बदलाव के कारण जन्म से होता है और यह बच्चे को माता-पिता से मिल सकता है।
ऑस्टियोजेनेसिस इम्परफेक्टा (Osteogenesis Imperfecta - OI) की पहचान कैसे करें?
इसकी पहचान अक्सर जन्म या बचपन में हो जाती है। कुछ आम लक्षण इस प्रकार हैं।
बार-बार हड्डियां टूटना: छोटी चोट पर भी हड्डियां आसानी से टूट जाती हैं।
कमज़ोर हड्डियां और ढीली हड्डी का ढांचा: हड्डियां पतली, नाजुक और असामान्य आकार की हो सकती हैं।
असामान्य रूप से लंबाई में कमी या कद का छोटा होना: कुछ बच्चों में कद सामान्य से कम होता है।
नाजुक दांत और कान की समस्या: दांत कमजोर या टूटने वाले हो सकते हैं, और सुनने की समस्या भी हो सकती है।
मांसपेशियों और जोड़ का कमजोरी: हड्डियों के साथ मांसपेशियों और जोड़ कमजोर हो सकते हैं।
स्किन और आंखों का लचीलापन: त्वचा पतली और लचीली हो सकती है, और आँखों का रंग नीला दिखाई दे सकता है।
मां का संकल्प बना बेटी की ताकत
गिरिजा की मां के लिए हर दिन एक चुनौती रहा। हर कदम पर यह डर कि कहीं बेटी को चोट न लग जाए। लेकिन उन्होंने अपनी बेटी को कभी खुद को कमजोर समझने नहीं दिया। उन्होंने उसे आत्मविश्वास दिया, हौसला सिखाया और यह भरोसा दिलाया कि ज़िंदगी सिर्फ़ शारीरिक क्षमता का नाम नहीं है।
दर्द है, लेकिन शिकायत नहीं
गिरिजा की कहानी उन तमाम धारणाओं को तोड़ती है, जहां बीमारी को बेचारगी से जोड़ दिया जाता है। उनकी ज़िंदगी में दर्द है, संघर्ष है, लेकिन कोई शिकवा नहीं। यह कहानी सहानुभूति नहीं, बल्कि समझ और सम्मान की मांग करती है।