नारी डेस्क: आजकल बच्चों की बदलती जीवनशैली और खराब खानपान की वजह से एक नई स्वास्थ्य समस्या तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि अब बच्चों में भी वे बीमारियां दिखाई देने लगी हैं, जो पहले आमतौर पर सिर्फ बड़ों में देखी जाती थीं। हाल ही में जारी हुई World Obesity Federation की रिपोर्ट World Obesity Atlas के अनुसार, बच्चों में मोटापे के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि बचपन में मोटापे के मामले में भारत दुनिया में दूसरे स्थान पर है, जबकि पहले स्थान पर China है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।
भारत में करोड़ों बच्चे मोटापे का शिकार
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 5 से 19 साल के करीब 4.1 करोड़ बच्चे ऐसे हैं जिनका बॉडी मास इंडेक्स (BMI) सामान्य से ज्यादा है। इनमें से लगभग 1.4 करोड़ बच्चे मोटापे (Obesity) से पीड़ित हैं। अनुमान है कि अगर यही स्थिति जारी रही तो साल 2040 तक यह संख्या बढ़कर लगभग 5.6 करोड़ बच्चों तक पहुंच सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी सबसे बड़ी वजह खराब खानपान, मीठे पेय पदार्थों का ज्यादा सेवन और शारीरिक गतिविधियों की कमी है।

शहरीकरण से बदल रही है बच्चों की डाइट
Zeeshan Ali, जो Physicians Committee for Responsible Medicine (Washington DC) से जुड़े पोषण वैज्ञानिक हैं, उनका कहना है कि तेजी से हो रहा शहरीकरण भी इस समस्या का एक बड़ा कारण है। उन्होंने बताया कि पहले भारतीय भोजन में दाल, सब्जियां, अनाज और अन्य पौधों से मिलने वाले पोषक तत्व अधिक होते थे। लेकिन अब इनकी जगह रेस्टोरेंट के खाने और पैकेज्ड फूड ने ले ली है। इन पैकेज्ड और फास्ट फूड में अक्सर रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट, ज्यादा चीनी और अस्वस्थ वसा (Unhealthy fats) होती है, जो बच्चों के स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक साबित हो रही है।
एक ही समाज में कुपोषण और मोटापा दोनों
भारत में एक और बड़ी समस्या सामने आ रही है। यहां कुपोषण और मोटापा दोनों एक साथ देखने को मिल रहे हैं। इसका मतलब यह है कि जहां एक ओर कुछ बच्चे पोषण की कमी से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कई बच्चे जरूरत से ज्यादा कैलोरी ले रहे हैं। यह समस्या केवल एक वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि विभिन्न सामाजिक और आर्थिक समूहों में भी दिखाई दे रही है।
पारंपरिक भारतीय भोजन को बढ़ावा देने की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए पारंपरिक भारतीय भोजन को फिर से अपनाने की जरूरत है। लोगों को रिफाइंड तेल, सैचुरेटेड फैट और ऐसे खाद्य पदार्थों से दूरी बनानी चाहिए जिनमें पोषक तत्व बहुत कम होते हैं। इसके बजाय घरेलू और पौष्टिक भोजन को बच्चों की डाइट का हिस्सा बनाना जरूरी है, जिससे उन्हें सही पोषण मिल सके।

दुनिया भर में भी बढ़ रही है बच्चों में मोटापे की समस्या
रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में 5 से 19 साल के 20 करोड़ से ज्यादा बच्चे मोटापे या अधिक वजन की समस्या से जूझ रहे हैं। इनमें से ज्यादातर बच्चे सिर्फ 10 देशों में रहते हैं, जिनमें भारत भी शामिल है। इससे यह साफ होता है कि यह समस्या अब वैश्विक स्तर पर चिंता का विषय बन चुकी है।
बचपन का मोटापा आगे चलकर बन सकता है बड़ी बीमारी
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर किसी बच्चे का वजन बचपन में ज्यादा हो जाता है, तो अक्सर यह समस्या बड़े होने पर भी बनी रहती है। ऐसे बच्चों में आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हृदय रोग और लिवर से जुड़ी बीमारियों का खतरा ज्यादा हो जाता है। इसके अलावा मोटापे की वजह से शरीर में इंसुलिन की संवेदनशीलता कम हो सकती है और फैट मेटाबॉलिज्म में भी गड़बड़ी हो सकती है।
बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है असर
मोटापा केवल शारीरिक स्वास्थ्य को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि इसका असर बच्चों के मानसिक और सामाजिक जीवन पर भी पड़ता है। ऐसे बच्चों को कई बार मजाक या भेदभाव का सामना करना पड़ता है, जिससे उनका आत्मविश्वास कम हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि किशोरावस्था के दौरान यह स्थिति कम आत्मसम्मान, तनाव और सामाजिक चुनौतियों का कारण भी बन सकती है।

समय रहते कदम उठाना जरूरी
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए सरकार, समाज और परिवार तीनों स्तरों पर मिलकर काम करने की जरूरत है। अगर बच्चों को बचपन से ही संतुलित भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि और स्वस्थ जीवनशैली की आदत डाली जाए, तो मोटापे और उससे जुड़ी बीमारियों को काफी हद तक रोका जा सकता है। इसलिए जरूरी है कि माता-पिता बच्चों के खानपान और दिनचर्या पर विशेष ध्यान दें, ताकि उनका भविष्य स्वस्थ और सुरक्षित रह सके।