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रोशन करने वाली लाइटें ही जिंदगी में ला रहीं अंधेरा, जानें कैसे बढ़ा रही हैं कैंसर का खतरा

  • Edited By Monika,
  • Updated: 15 Feb, 2026 03:18 PM
रोशन करने वाली लाइटें ही जिंदगी में ला रहीं अंधेरा, जानें कैसे बढ़ा रही हैं कैंसर का खतरा

नारी डेस्क : रात में चमकती स्ट्रीट लाइट्स, घरों में जलती एलईडी लाइट्स और मोबाइल–स्क्रीन की नीली रोशनी अब हमारे आधुनिक जीवन का अहम हिस्सा बन गई हैं। लेकिन कई अंतरराष्ट्रीय रिसर्च चेतावनी दे रही हैं कि रात के समय इन कृत्रिम रोशनियों (Artificial Light at Night) के संपर्क में रहना सेहत के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। अध्ययन बताते हैं कि इससे शरीर में हार्मोनल असंतुलन पैदा हो सकता है और कैंसर का जोखिम भी बढ़ सकता है।

मेलाटोनिन पर पड़ता है सीधा असर, ट्यूमर का खतरा

अमेरिका के National Institute of Environmental Health Sciences की रिसर्च में पाया गया कि रात में तेज या लगातार रोशनी के संपर्क में रहने से शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन का स्तर दब जाता है। मेलाटोनिन न सिर्फ नींद और बॉडी क्लॉक को नियंत्रित करता है, बल्कि इसमें ट्यूमर-रोधी गुण भी होते हैं। रिसर्च में यह भी सामने आया कि जिन महिलाओं की नींद के दौरान रोशनी से बाधित हुई, उनके खून में कैंसर से लड़ने की क्षमता कम पाई गई। वहीं, पूरी तरह अंधेरे में सोने वालों के ब्लड सैंपल्स ने पशु मॉडल में ट्यूमर की वृद्धि को धीमा किया। यह अध्ययन 2005 में जर्नल Cancer Research में प्रकाशित हुआ था।

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एलईडी और नीली रोशनी क्यों ज्यादा खतरनाक?

ब्रिटेन की University of Exeter और स्पेन के Barcelona Institute of Global Health के वैज्ञानिकों ने मैड्रिड और बार्सिलोना में करीब 4,000 लोगों पर अध्ययन किया। रिसर्च में पाया गया कि एलईडी से निकलने वाली नीली रोशनी के ज्यादा संपर्क में रहने वालों में ब्रेस्ट और प्रोस्टेट कैंसर का खतरा करीब 1.5 गुना तक बढ़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, नीली रोशनी शरीर की सर्केडियन रिदम (जैविक घड़ी) को बिगाड़ती है, जिससे हार्मोनल असंतुलन पैदा होता है।

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नाइट शिफ्ट करने वालों के लिए ज्यादा खतरा

International Agency for Research on Cancer (IARC) पहले ही रात की पाली में काम करने को संभावित कैंसर-कारक श्रेणी में रख चुका है। रात में लगातार रोशनी के कारण मेलाटोनिन दबता है और यह एस्ट्रोजन जैसी हार्मोनल गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है। 2016 में 158 देशों के आंकड़ों पर आधारित एक ग्लोबल स्टडी में पाया गया कि जिन क्षेत्रों में रात की कृत्रिम रोशनी ज्यादा थी, वहां ब्रेस्ट, फेफड़े, प्रोस्टेट, कोलोरेक्टल और थायरॉइड कैंसर के मामले भी अधिक देखे गए।

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कैसे करें बचाव?

विशेषज्ञ मानते हैं कि आधुनिक जीवन में रोशनी से पूरी तरह बचना संभव नहीं है, लेकिन कुछ सावधानियां जोखिम कम कर सकती हैं।
रात में हल्की और पीली रोशनी का उपयोग करें
सोने से पहले मोबाइल और स्क्रीन का इस्तेमाल कम करें
मोबाइल/टीवी में ब्लू लाइट फिल्टर या नाइट मोड ऑन रखें
सोते समय कमरे को पूरी तरह अंधेरा रखें
नाइट शिफ्ट करने वालों को नींद के समय आंखों पर आई मास्क का इस्तेमाल करना चाहिए।

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घर और शहर को रोशन करने वाली लाइटें अगर सही तरीके से इस्तेमाल न की जाएं, तो वही रोशनी धीरे-धीरे सेहत पर अंधेरा डाल सकती है। समय रहते सावधानी अपनाकर इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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