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सोमवार को भगवान शिव की पूजा क्यों की जाती है? जानें पौराणिक कथा

  • Edited By Monika,
  • Updated: 26 Jan, 2026 01:50 PM
सोमवार को भगवान शिव की पूजा क्यों की जाती है? जानें पौराणिक कथा

नारी डेस्क : सप्ताह का पहला दिन यानी सोमवार भगवान शिव को समर्पित होता है। यह दिन सिर्फ सप्ताह की शुरुआत ही नहीं, बल्कि भक्ति, आस्था और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक भी माना जाता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि सोमवार को ही भगवान शिव की पूजा क्यों विशेष रूप से की जाती है। इस दिन की पूजा करने से श्रद्धालुओं को सुख, शांति, समृद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं पौराणिक कथा और धार्मिक मान्यता।

सप्ताह और देवताओं की पूजा

सनातन धर्म के अनुसार, सप्ताह के सात दिन अलग-अलग देवताओं को समर्पित हैं। श्रद्धालु यदि निर्धारित दिन पर किसी देवता की भक्ति और पूजा करते हैं, तो उन्हें विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। सोमवार भगवान शिव, शंभूनाथ की पूजा के लिए समर्पित है। जो भक्त सोमवार को भक्ति और निर्मल हृदय से भोलेनाथ की पूजा करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और भगवान शिव उन पर अपनी कृपा बरसाते हैं।

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सोमवार क्यों विशेष?

नाम में निहित कारण: सोमवार शब्द में 'सोम' का अर्थ चंद्रमा है। चंद्रमा भगवान शिव के सिर पर विराजमान हैं। इसलिए सोम + वार = सोमवार।
ओंकार से संबंध: सोमवार में 'ओम' का उच्चारण भी होता है। भगवान शिव को ओंकार कहा जाता है। इस प्रकार सोमवार और शिव के बीच आध्यात्मिक संबंध जुड़ा है।
सोमेश्वर व्रत: श्रद्धालु सोमवार को सोमेश्वर व्रत रखते हैं। इस दिन चंद्रमा की पूजा भी की जाती है।

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पौराणिक कथा

कथाओं के अनुसार, चंद्रदेव ने सोमवार को भगवान शिव की पूजा की थी। महादेव उनसे प्रसन्न हुए और उन्हें स्वस्थ शरीर का आशीर्वाद दिया। यही कारण है कि सोमवार को भगवान शिव की पूजा विशेष माना जाता है। बता दें की माता पार्वती ने अपने प्रेम और भोलेनाथ को पाने के लिए 16 सोमवारों तक उपवास रखा था। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।

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आधुनिक मान्यताएं

आधुनिक समय में सोमवार और भांग भी भगवान शिव से जुड़े माने जाते हैं। यह परंपरा सोमदेव यानी चंद्रदेव से संबंधित है। ब्राह्मण और साधु मादक पदार्थों से परहेज करते हैं, जैसा कि सोमदेव ने उपवास और तपस्या के समय किया था। इस प्रकार, सोमवार भगवान शिव की पूजा का विशेष दिन है और यह परंपरा आज भी श्रद्धालुओं के बीच जारी है।
 

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