नारी डेस्क: 5 से 7 साल की उम्र में भी अगर बच्चा रात को सोते समय बिस्तर पर पेशाब कर देता है, तो इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। कभी-कभी यह अनुवांशिक होता है, यानी माता-पिता में किसी को यह समस्या रही हो। इसके अलावा यह किसी हेल्थ प्रॉब्लम के कारण भी हो सकता है। लेकिन अधिकतर मामलों में बच्चे को सही ट्रेनिंग और आदत डालने की जरूरत होती है।
बच्चे में बिस्तर गीला करने की वजहें
छोटे बच्चों में यह सामान्य है और इसे ‘नॉक्टर्नल एन्यूरेसिस’ कहा जाता है। कई बार बच्चे गहरी नींद में होते हैं और मस्तिष्क ब्लैडर को भरे होने का संकेत नहीं भेजता। सपनों में यूरिन की आवश्यकता महसूस करना, नींद में जागने की कमी, और उम्र के अनुसार मस्तिष्क और शरीर के अंगों के बीच संबंध विकसित होने तक यह समस्या रह सकती है। 5 साल की उम्र तक करीब 15% बच्चे रात में बिस्तर गीला कर देते हैं। 7 साल के बाद भी अगर समस्या बनी रहती है तो डॉक्टर से सलाह जरूरी है।

बच्चों को कैसे दें ड्राई बेड ट्रेनिंग
सोने से पहले तरल चीजें कम दें: दिन में बच्चे को पानी और हेल्दी ड्रिंक्स जरूर दें, लेकिन सोने से 1-2 घंटे पहले बहुत अधिक तरल पदार्थ न दें। इससे रात में बार-बार पेशाब आने की संभावना कम होती है।
सोने से पहले टॉयलेट करवाएं: रात को सोने से ठीक पहले बच्चे को टॉयलेट भेजें। इसे रोजाना करने से बच्चा धीरे-धीरे यह आदत सीख जाता है।

डायपर का इस्तेमाल बंद करें: अगर बच्चा डायपर पहनता है तो यह उसके लिए सहारा बन जाता है, और मस्तिष्क को यह संकेत मिलता है कि पेशाब करने के लिए जागने की जरूरत नहीं। डायपर बंद करने से बच्चा अपनी बॉडी सिग्नल को समझने लगता है।

रात में बच्चे को धीरे-धीरे जगाएं: ड्राई बेड ट्रेनिंग के लिए रात में बच्चे को कुछ समय के लिए जगाना होता है। पहले दिन, रात को लगभग 1 बजे बच्चे को उठाएं और वॉशरूम ले जाएं। दूसरे दिन, सोने के 3 घंटे बाद जगाएं। तीसरे से पांचवे दिन, इसे दोहराएं। छठी रात तक बच्चे की आदत बन जाती है कि वह खुद ही जागने की कोशिश करे।
और क्या ध्यान रखें
बच्चे को बिस्तर गीला करने पर शर्मिंदा न करें, बल्कि प्यार और समझदारी से संभालें। अगर समस्या अचानक शुरू हो जाए या 7 साल की उम्र के बाद भी बनी रहे, तो डॉक्टर से संपर्क करें। ड्राई बेड ट्रेनिंग के बाद भी अगर सुधार नहीं आता है, तो एक्सपर्ट की मदद लेना जरूरी है। बच्चों में रात में बिस्तर गीला करना आम है और यह धीरे-धीरे सही ट्रेनिंग और समझदारी से सुधारा जा सकता है। पेरेंट्स को धैर्य रखना चाहिए और बच्चे को डर या शर्मिंदा किए बिना इस समस्या को हल करना चाहिए।