
नारी डेस्क: होली खुशियों, रंगों और अपनापन बांटने का त्योहार है। लेकिन हर साल कुछ ऐसी घटनाएं भी सामने आती हैं, जो इस त्योहार की भावना को ठेस पहुंचाती हैं। इसलिए जरूरी है कि रंग खेलने से पहले हम अपने बेटों को मर्यादा, सम्मान और जिम्मेदारी का सही अर्थ सिखाएं। यानी कि इस होली, रंगों से पहले बेटों को जिम्मेदारी का रंग जरूर चढ़ाएं।

“पहले अनुमति, फिर रंग”
किसी भी लड़की या महिला पर रंग डालने से पहले साफ-साफ पूछना सिखाएं। अगर सामने वाला “ना” कहे, तो उस “ना” का सम्मान करना ही असली संस्कार है। उन्हें बताएं कि बिना अनुमति लगाया गया रंग, मज़ाक नहीं गलत व्यवहार है।
शरीर की मर्यादा समझाएं
उन्हें बताएं कि होली के बहाने किसी को छूना, खींचना या जबरदस्ती करना बिल्कुल गलत है। त्योहार का मतलब यह नहीं कि सीमाएं खत्म हो जाती हैं। किसी के कपड़ों, शरीर या रूप पर फब्तियां कसना या गंदे मजाक करना भी गलत है। त्योहार की खुशी का मतलब किसी को असहज करना नहीं होता।
नशे से दूर रहने की सीख
भांग या शराब के नशे में अक्सर लोग अपनी सीमाएं भूल जाते हैं। बेटों को समझाएं कि असली मस्ती होश में और सम्मान के साथ होती है। उन्हें समझाएं कि होली प्यार और भाईचारे का त्योहार है, डर और असुरक्षा का नहीं।

कमजोर का साथ देना
अगर वे देखें कि किसी लड़की या महिला के साथ बदतमीजी हो रही है, तो चुप न रहें। उन्हें सिखाएं कि सही के साथ खड़ा होना ही असली बहादुरी है। बेटों को यह भी बताएं कि हर लड़की किसी की बहन, बेटी या मां है और सबसे पहले एक इंसान है। सम्मान सिर्फ घर की महिलाओं का नहीं, हर महिला का होना चाहिए।
माता-पिता की भूमिका
बच्चे वही सीखते हैं जो वे घर में देखते हैं। अगर घर में महिलाओं के प्रति सम्मान दिखेगा, तो वही व्यवहार बाहर भी नजर आएगा। याद रखें
संस्कार किताबों से नहीं, रोजमर्रा के व्यवहार से बनते हैं।