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छोटे बच्चों के आंखों के चेकअप को लेकर कभी ना करना ये गलती

  • Edited By vasudha,
  • Updated: 21 Feb, 2026 12:01 PM
छोटे बच्चों के आंखों के चेकअप को लेकर कभी ना करना ये गलती

नारी डेस्क:  बहुत से माता-पिता सोचते हैं कि बच्चों की आंखों की जांच तब करानी चाहिए जब उन्हें साफ दिखाई न दे या वे शिकायत करें। लेकिन आंखों के विशेषज्ञों के अनुसार जल्दी और नियमित आई चेक-अप बच्चों के भविष्य के लिए बेहद जरूरी है।  आइए समझते हैं क्यों और किन आम गलतफहमियों को दूर करना जरूरी है।

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जल्दी आंखों की जांच क्यों जरूरी है?

 बच्चे हमेशा अपनी परेशानी बता नहीं पाते: छोटे बच्चे अक्सर यह समझ ही नहीं पाते कि उन्हें धुंधला दिखाई दे रहा है। उन्हें लगता है कि सबको ऐसा ही दिखता है। ऐसे में समस्या देर से पकड़ में आती है।

“आलसी आंख” (Lazy Eye) का खतरा: अगर एक आंख कमजोर है और समय पर इलाज न हो, तो दिमाग उस आंख को नजरअंदाज करने लगता है। इसे एम्ब्लायोपिया कहा जाता है। यह समस्या 7–8 साल की उम्र के बाद ठीक करना मुश्किल हो सकती है।

पढ़ाई और व्यवहार पर असर: धुंधली नजर के कारण बच्चा  पढ़ाई में पीछे रह सकता है, जल्दी थक सकता है,  सिरदर्द की शिकायत कर सकता है। ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई हो सकती है


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बच्चों की आंखों से जुड़े आम मिथक (और सच्चाई)

 मिथक 1: “अगर बच्चा टीवी पास से देखता है तो नजर खराब हो गई है।”

 सच्चाई: कभी-कभी आदत या जिज्ञासा भी कारण हो सकती है। लेकिन बार-बार ऐसा हो तो जांच जरूरी है।

मिथक 2: “आंखों की जांच सिर्फ स्कूल जाने के बाद जरूरी है।”

 सच्चाई: विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि जन्म के बाद बेसिक जांच, 6 महीने की उम्र में, 3 साल की उम्र में और फिर स्कूल शुरू होने से पहले जांच करानी चाहिए।

मिथक 3: “चश्मा लगाने से आंखें और कमजोर हो जाती हैं।”

सच्चाई: सही नंबर का चश्मा आंखों को आराम देता है और नजर सुधारने में मदद करता है। यह कमजोरी नहीं बढ़ाता।

मिथक 4: “बच्चे बड़े होकर खुद ठीक हो जाएंगे।”

सच्चाई: कुछ समस्याएं समय के साथ ठीक नहीं होतीं, बल्कि बढ़ सकती हैं।


इन संकेतों पर रखें नजर

-बार-बार आंखें मिचमिचाना
-सिर झुकाकर देखना
-किताब बहुत पास लाकर पढ़ना
-बार-बार सिरदर्द
-आंखों में पानी आना या लाल रहना


स्क्रीन टाइम और आंखों की सेहत

आजकल मोबाइल और टैबलेट का ज्यादा इस्तेमाल बच्चों की आंखों पर असर डाल सकता है। 20-20-20 नियम अपनाएं (हर 20 मिनट बाद 20 सेकंड के लिए 20 फीट दूर देखें)।  बाहर खेलने का समय बढ़ाएं। स्क्रीन का समय सीमित रखें। बच्चों की आंखें उनके सीखने और विकास का अहम हिस्सा हैं। जल्दी जांच = समय पर पहचान = बेहतर इलाज है।  अगर आपका बच्चा बिल्कुल ठीक भी दिख रहा हो, तब भी नियमित आंखों की जांच करवाना समझदारी है। छोटी सी सावधानी, भविष्य की बड़ी समस्या से बचा सकती है।

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