नारी डेस्क : क्या आपको याद है बचपन में जब कोई गलती होती थी और आपको सबके सामने डांट पड़ती थी या सजा दी जाती थी? उस समय सुधार के बजाय डर और शर्मिंदगी मन में बैठ जाती थी। आधुनिक मनोविज्ञान यह कहता है कि बच्चों को सुधारने के लिए उन्हें शर्मिंदा करना जरूरी नहीं है। इसे ही कहते हैं ‘नो-शेम पेरेंटिंग’, यानी बच्चों के व्यवहार को उनकी पहचान से अलग करके सुधारना।
नो-शेम पेरेंटिंग क्या है?
नो-शेम पेरेंटिंग का मतलब है बच्चे के व्यवहार को उसकी पूरी पहचान से अलग करके देखना।
गलत तरीका: तुम बहुत बुरे हो। इससे बच्चे को शर्मिंदगी महसूस होती है।
सही तरीका: तुम्हारा यह व्यवहार सही नहीं था। इससे बच्चे को अपनी गलती सुधारने का मौका मिलता है।
डॉक्टर के अनुसार बच्चे उसी तरह व्यवहार करते हैं जैसा वे महसूस करते हैं। प्यार और सम्मान देने से वे खुद-ब-खुद अच्छा व्यवहार करना सीखते हैं।
शर्मिंदगी सुधार का साधन नहीं है, बल्कि यह बदलाव में सबसे बड़ी बाधा है।

नो-शेम पेरेंटिंग के 3 मुख्य तरीके
‘सजा’ नहीं, परिणाम समझाएं
सजा बच्चे को केवल तकलीफ देती है, जबकि परिणाम उसे अपनी जिम्मेदारी समझने का मौका देता है।
उदाहरण: अगर बच्चा खिलौना तोड़ देता है, तो उसे बताएं कि अब उसके पास खेलने के लिए वह खिलौना नहीं रहेगा। इससे वह अगली बार ज्यादा ध्यान रखेगा।
चिल्लाने के बजाय ‘कनेक्शन’ बनाएं
बच्चा गलती करने पर पहले से ही डर महसूस करता है, इसलिए चिल्लाने से आपसे दूरी बढ़ जाती है।
उसके पास बैठें, आंखों में आंखें डालकर शांत तरीके से बात करें और पूछें, “क्या हुआ?”
इससे बच्चा सुरक्षित महसूस करता है और अपनी गलती सच बोलकर स्वीकार कर पाता है।
‘टाइम-आउट’ नहीं, ‘टाइम-इन’ दें
अकेले कमरे में बंद करने की बजाय बच्चे को अपने पास बैठाएं। उसकी भावनाओं को समझें पूछें, “क्या तुम गुस्से में हो?
दुखी हो?” इससे बच्चा अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना सीखता है।

नो-शेम पेरेंटिंग के फायदे
आत्मसम्मान बढ़ता है: बच्चे खुद पर भरोसा रखते हैं और गलती सुधारने में सक्षम बनते हैं।
ईमानदारी बढ़ती है: सजा के डर के बिना बच्चे अपनी गलती मान लेते हैं।
मजबूत बॉन्डिंग: बच्चा बड़ी उम्र में भी अपनी समस्याओं के लिए सबसे पहले माता-पिता के पास आएगा।
पेरेंट्स के लिए टिप्स
अगर आपा खोकर चिल्ला दें, तो खुद को दोषी न समझें।
बच्चे से माफी मांगें और दिखाएं कि बड़े भी अपनी गलती सुधार सकते हैं।
अनुशासन का मतलब डर पैदा करना नहीं, बल्कि सही दिशा दिखाना है।
नो-शेम पेरेंटिंग अपनाकर आप सिर्फ जिम्मेदार और सम्मानित बच्चे नहीं, बल्कि अपने घर में प्यार और विश्वास की मजबूत नींव भी रख सकते हैं।