नारी डेस्क: मेनोपॉज के दौरान कई महिलाएं ऑफिस में चुपचाप तकलीफ़ सहती रहती हैं। मेनोपॉज कोई कमजोरी नहीं, बल्कि महिलाओं के जीवन का एक स्वाभाविक चरण है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर ऑफिस कल्चर थोड़ा और समझदार व सपोर्टिव बने, तो महिलाएं बिना डर के काम कर सकती हैं और अपनी पूरी क्षमता दिखा सकती हैं।
मेनोपॉज़ में महिलाएं काम पर क्यों चुप रहती हैं?
लक्षणों पर बात करना “टैबू” माना जाता है: हॉट फ्लैश, ज़्यादा पसीना, मूड स्विंग्स, थकान, नींद की कमी या ब्रेन फॉग। इन समस्याओं पर खुलकर बात करना आज भी कई ऑफिस कल्चर में असहज माना जाता है।
जज किए जाने का डर: कई महिलाओं को लगता है कि अगर उन्होंने मेनोपॉज़ की बात की तो उन्हें कम सक्षम समझा जाएगा। इसका प्रमोशन या जिम्मेदारियों पर असर पड़ सकता है। इस डर से वे दर्द और परेशानी को अंदर ही अंदर झेलती रहती हैं।
लक्षण सीधे काम की परफॉर्मेंस को प्रभावित करते हैं: एक्सपर्ट्स के मुताबिक मेनोपॉज़ के दौरान याददाश्त कमजोर होना, फोकस में कमी, बार-बार थक जाना जैसी समस्याएं काम पर असर डालती हैं, लेकिन सपोर्ट न मिलने से स्थिति और बिगड़ जाती है।
एक्सपर्ट्स क्या बदलाव चाहते हैं?
हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि जैसे मैटरनिटी बेनिफिट्स होते हैं, वैसे ही मेनोपॉज़ सपोर्ट पॉलिसी, फ्लेक्सिबल वर्किंग आवर्स, जरूरत पड़ने पर वर्क फ्रॉम होम जैसी सुविधाएं होनी चाहिए। मैनेजर्स और HR कोमेनोपॉज़ के लक्षणों की ट्रेनिंग महिलाओं से संवेदनशील और सपोर्टिव बातचीतके लिए तैयार किया जाना चाहिए, ताकि महिलाएं खुद को अकेला न समझें।
ऑफिस में छोटे लेकिन जरूरी बदलाव
जैसे बेहतर वेंटिलेशन, ठंडा पानी आसानी से उपलब्ध होना, क लेने की आज़ादी ये छोटे कदम महिलाओं की परेशानी काफी कम कर सकते हैं। मेनोपॉज़ सिर्फ शारीरिक नहीं, मानसिक और भावनात्मक बदलाव भी लाता है। एक्सपर्ट्स चाहते हैं कि काउंसलिंग सपोर्ट मेंटल हेल्थ डे जैसी सुविधाएं दी जाएं।चुप रहने की जगह अब समझ, सहयोग और बातचीत की ज़रूरत है।