
नारी डेस्क: भारत में विज़न लॉस (दृष्टि हानि) एक प्रमुख स्वास्थ्य समस्या बन गई हैं, जिसके करोड़ों लोग शिकार हैं। ग्लूकोमा, डायबिटिक रेटिनोपैथी, मोतियाबिंद और रेटिना से जुड़ी बीमारियां अक्सर शुरुआती स्टेज में बिना किसी खास लक्षण के चुपचाप डेवलप होती हैं। नेत्र विशेषज्ञें की मानें तो भारत में होने वाला ज्यादातर दृष्टि हानि समय रहते रोकी जा सकती है, लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि लोग बहुत देर से जांच करवाते हैं, जब नुकसान काफी बढ़ चुका होता है। इसलिए रेगुलर आंखों की जांच, समय पर बीमारी का पता लगाना, इलाज को फॉलो करना और समय-समय पर फॉलो-अप ज़रूरी हैं।

भारत में विज़न लॉस बढ़ने के कारण
देर से पता चलना सबसे बड़ी वजह है। लोग आंखों की जांच तभी कराते हैं जब दिखना बहुत कम हो जाए, दर्द या परेशानी बढ़ जाए। जबकि कई आंखों की बीमारियां शुरुआत में बिना लक्षणों के बढ़ती हैं। जब तक लक्षण दिखते हैं, तब तक नुकसान स्थायी हो चुका होता है
ये आंखों की बीमारियां समय पर पकड़ में आ जाएं तो बच सकती है रोशनी
मोतियाबिंद (Cataract): भारत में अंधेपन की सबसे बड़ी वजह है ये। समय पर सर्जरी से पूरी तरह ठीक हो सकता है लेकिन लोग इसे “उम्र का असर” मानकर टाल देते हैं
ग्लूकोमा (Glaucoma) “साइलेंट किलर”: यह धीरे-धीरे आंखों की नस को नुकसान पहुंचाती है। शुरुआत में कोई दर्द, कोई लक्षण नहीं होता इसमें एक बार नजर गई तो वापस नहीं आती। केवल नियमित जांच से ही समय पर पता चलता है
डायबिटिक रेटिनोपैथी: शुगर के मरीजों में यह समस्या आम है। यह आंखों की रेटिना को नुकसान पहुंचाती है। समय पर इलाज से अंधेपन से बचाव संभव
बच्चों में रिफ्रैक्टिव एरर: चश्मे की जरूरत को नजरअंदाज कर दिया जाता है। इससे पढ़ाई और आंखों के विकास पर असर पड़ता है

आंखों की रोशनी बचाने के आसान उपाय
साल में एक बार आंखों की जांच करवएं। डायबिटीज, हाई बीपी वालों को खास सावधानी बरतने की जरूरत है। बच्चों की स्कूल उम्र में नियमित स्क्रीनिंग करानी चाहिए। धुंधला दिखे, सिरदर्द, आंखों में जलन हो तो नजरअंदाज न करें। आई सर्जनों के अनुसार भारत में 80% तक विज़न लॉस रोका जा सकता है, बस ज़रूरत है समय पर जांच और जागरूकता की। आंखों की रोशनी एक बार चली जाए तो वापस नहीं आती इसलिए देर न करें, आज ही जांच कराएं।