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हाथ में छड़ी-टॉर्च, बाघों से घिरे जंगल में बच्चों की पढ़ाई के लिए जान की बाजी लगाने वाली चार महिलाएं

  • Edited By Monika,
  • Updated: 15 Feb, 2026 04:13 PM
हाथ में छड़ी-टॉर्च, बाघों से घिरे जंगल में बच्चों की पढ़ाई के लिए जान की बाजी लगाने वाली चार महिलाएं

नारी डेस्क : मां, मैं स्कूल नहीं जाऊंगा; मुझे लगता है कोई बाघ मेरा पीछा कर रहा है।”चार वर्षीय बच्चे के इन शब्दों ने किरण गेदम के रोंगटे खड़े कर दिए। यह कोई जंगल सफारी की कहानी नहीं, बल्कि सीताराम पेठ गांव में रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है। बता दें की महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के ताडोबा टाइगर रिजर्व के सीताराम पेठ गांव में बाघों का खतरा हमेशा मंडराता रहता है। स्कूल जाने वाले बच्चों की सुरक्षा के लिए चार महिलाएं, जिन्हें वन विभाग ने सम्मान स्वरूप ‘मातृशक्ति’ का नाम दिया है, लाठी और टॉर्च लेकर बच्चों को बस स्टैंड तक ले जाती हैं।

बाघों के बीच बसी जिंदगी

सीताराम पेठ गांव घने जंगल से घिरा हुआ है और यहां रोज़ बाघों के हमले का खतरा रहता है। गांव के चारों ओर तार की बाड़ें लगी हैं, लेकिन इनसे खतरे को रोकना मुश्किल है। 2017 और 2022 में गांव के दो भाइयों पर हुए जानलेवा हमलों ने गांववासियों को हर दिन खौफ में जीने पर मजबूर कर दिया। ताडोबा टाइगर रिजर्व में लगभग 120 बाघ हैं। जबकि देश-दुनिया से आने वाले टूरिस्टों के लिए यह रोमांचक है, गांववासियों के लिए यह रोज़मर्रा की जिंदगी में सतत खतरे का सामना करना है।

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स्कूल जाने का खतरनाक रास्ता

गांव से बस स्टैंड तक का कच्चा रास्ता लगभग 400 मीटर लंबा है। सड़क पर कोई स्ट्रीटलाइट नहीं है। एक ओर घना जंगल, दूसरी ओर खुले खेत। गांव के करीब 17 बच्चे रोज़ स्कूल जाने के लिए इस रास्ते से गुजरते हैं। किरण गेदम बताती हैं, रास्ते पर अक्सर बाघ दिखाई देता था। बच्चे हर रोज डर के मारे घर लौटते थे। मेरा बेटा हर दूसरे दिन कहता था कि उसने बाघ को देखा। मेरे पति पास के रिसॉर्ट में काम करते हैं, इसलिए उनसे मदद नहीं मांग सकते। फिर हम चारों ने बच्चों की सुरक्षा के लिए पहरा देने का फैसला किया।

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मातृशक्ति की सुरक्षा व्यवस्था

किरण, वेणु रंडाये, रीना नट और सीमा मडावी चारों महिलाएं लकड़ी की छड़ियां और टॉर्च लेकर बच्चों की सुरक्षा करती हैं।
सुबह 9:30 बजे बस स्टैंड के लिए निकलती हैं
बच्चों को चारों ओर से घेरकर बस तक पहुंचाती हैं
रास्ते से लेकर बस स्टैंड तक और बस में चढ़ने तक लगातार नजर रखती हैं।

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किरण बताती हैं

वन विभाग ने हमें डंडे और टॉर्च दिए हैं और उन्होंने हमारा नाम मातृशक्ति रखा है। शाम को बच्चे बस से लौटते हैं, तब तक अंधेरा हो जाता है। हम डंडियों से शोर मचाते, टॉर्च से रास्ता देखते और बच्चों को लेकर जोर-जोर से बात करते हुए चलते हैं ताकि कोई बाघ पास में हो तो भाग जाए। सीताराम पेठ की यह कहानी साहस और मातृत्व शक्ति का उदाहरण है। चार महिलाओं ने अपने डर को पीछे छोड़कर बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित की और यह साबित किया कि कभी-कभी साहस ही सबसे बड़ी सुरक्षा होता है।

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