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शादी के बाद सुधर जाती है पुरुषों को जिंदगी , पर महिलाएं के साथ नहीं होता ऐसा

  • Edited By vasudha,
  • Updated: 31 Dec, 2025 05:55 PM
शादी के बाद सुधर जाती है पुरुषों को जिंदगी , पर महिलाएं के साथ नहीं होता ऐसा

नारी डेस्क: शादी से महिलाओं के मुकाबले पुरुषों को ज़्यादा फ़ायदा होता है, इसलिए नहीं कि पुरुष बुरे होते हैं बल्कि इसलिए क्योंकि महिलाओं का बिना पैसे वाला श्रम (Unpaid Labor) सामान्य मान लिया गया है। रिसर्च से पता चलता है कि पुरुषों को शादी से बेहतर सेहत, इमोशनल सपोर्ट, आर्थिक स्थिरता और लंबी उम्र मिलती है, जबकि महिलाओं को ज़्यादा घरेलू काम, इमोशनल मेहनत और करियर में नुकसान उठाना पड़ता है। हम पुरुषों की बुराई नहीं कर रहे बल्कि सिस्टम में महिलाओं के बिना मेहनताना काम की बात कर रहे हैं।

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महिलाओं का अनदेखा किया गया “अनपेड लेबर”

शादी के बाद महिलाएं  घर का सारा काम खाना बनाना, सफ़ाई, बच्चों और बुज़ुर्गों की देखभाल परिवार की भावनात्मक ज़िम्मेदारी निभाती हैं।  इन सबका कोई वेतन नहीं लेकिन ये काम परिवार को चलाने की रीढ़ होते हैं।


 पुरुषों को शादी से क्या फायदे मिलते हैं?

रिसर्च के अनुसार शादीशुदा पुरुष ज़्यादा स्वस्थ रहते हैं। उनकी आय और करियर ग्रोथ बेहतर होती है। तनाव कम और उम्र लंबी होती है  वजह यह कि घर की ज़िम्मेदारियां संभालने वाला कोई होता है, जिससे पुरुष काम और करियर पर ज़्यादा ध्यान दे पाते हैं।

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 महिलाओं के लिए शादी क्यों ज़्यादा चुनौतीपूर्ण होती है?

शादी के बाद सभी का तो नहीं लेकिन कुछ को करियर से ब्रेक लेना पड़ता है। अगर नौकरी करते हैं तो  घर और ऑफिस का डबल बोझ पड़ता है। भावनात्मक थकान बढ़ती है। अपनी ज़रूरतों को आख़िरी प्राथमिकता देने लगती हैं। इसलिए कई स्टडीज़ में देखा गया है कि शादीशुदा महिलाएं, खासकर मां बनने के बाद ज़्यादा तनाव और थकान महसूस करती हैं।


यह पुरुष बनाम महिला की लड़ाई नहीं है

यह बात समझना ज़रूरी है कि पुरुष “गलत” नहीं हैं शादी “खराब संस्था” नहीं है। समस्या उस सोशल सिस्टम की है, जो महिलाओं के काम को “फ़र्ज़” मानता है लेकिन पुरुषों के लिए “मदद” कहता है। ऐसे में समाधान यह है कि पुरुष भी घर के काम की बराबर हिस्सेदारी लें।  केयर वर्क की पहचान और सम्मान करें। महिलाओं के करियर को बराबर महत्व दें। मानसिक और भावनात्मक सपोर्ट की साझेदारी बेहद जरूरी है। शादी तब सही मायने में साझेदारी बनती है, जब घर का काम “महिलाओं की ज़िम्मेदारी” नहीं  बल्कि “दो लोगों की साझा ज़िम्मेदारी” माना जाए। बराबरी से किया गया रिश्ता ही दोनों को सच में मजबूत बनाता है।
 

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