
नारी डेस्क : विजय देवरकोंडा और रश्मिका मंदाना की शादी के दौरान उनका एक विशेष लुक सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया। दूल्हे विजय ने अपने हाथों और पैरों में आलता पहना, जिसे आमतौर पर केवल दुल्हनों से जोड़ा जाता है। यह सिर्फ एक फैशन स्टेटमेंट नहीं था, बल्कि संस्कृति, परंपरा और लिंग आधारित नियमों को नए ढंग से पेश करने का प्रतीक भी बन गया।
आलता क्या है?
आलता भारत में हाथों और पैरों पर लगाई जाने वाली लाल तरल डाई है। यह विशेषकर बंगाल, ओडिशा और दक्षिण भारत में दुल्हनों द्वारा अपनाई जाती है। इसे शुभता, समृद्धि और देवी लक्ष्मी से जुड़ा माना जाता है। पारंपरिक रूप से यह नारीत्व और दुल्हन के श्रृंगार का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

पुरुषों द्वारा आलता पहनना: दुर्लभ परंपरा
आजकल शादियों में पुरुषों का आलता पहनना बेहद दुर्लभ है। प्राचीन काल में राजा, राजकुमार और दूल्हे इसे एक रस्म के रूप में अपनाते थे। विजय देवरकोंडा ने इस प्रथा को फिर से जीवित किया और इसे आधुनिक युग में नए अर्थों के साथ पेश किया। यह सिर्फ पारंपरिक सीमाओं को चुनौती देने का प्रतीक नहीं, बल्कि समान भागीदारी और सांस्कृतिक परंपराओं को विकसित करने का संदेश भी देता है।
महिलाओं के लिए आलता का महत्व
महिलाओं के लिए आलता केवल सजावट नहीं है। यह विवाह, सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक है। दुल्हन के श्रृंगार का यह हिस्सा उनके जीवन में शुभता और खुशहाली का संदेश देता है। भारत के कुछ क्षेत्रों में, शादी के बाद दुल्हन से प्रतिदिन आलता पहनने की परंपरा निभाने की अपेक्षा की जाती है।

विजय देवरकोंडा का आलता लुक क्यों खास है?
विजय का यह लुक पारंपरिक दुल्हन के आभूषणों को अपनाने का प्रतीक है। यह शादी में समान भागीदारी और लिंग आधारित रूढ़ियों को चुनौती देता है। इसे देखकर यह साफ होता है कि आभूषण केवल महिलाओं तक सीमित नहीं हैं और परंपराओं को समय के अनुसार नया रूप दिया जा सकता है। विजय और रश्मिका का यह लुक न केवल फैशन और स्टाइल का उदाहरण है, बल्कि यह सांस्कृतिक जागरूकता और लिंग समानता का भी संदेश देता है। इस शादी ने दिखा दिया कि परंपराओं को आधुनिक दौर में अपनाना कितना खूबसूरत और प्रभावशाली हो सकता है।