नारी डेस्क: पश्चिम बंगाल में दो मामले सामने आने के बाद निपाह वायरस इस समय दुनिया भर के लिए चिंता का विषय बन गया है। यह वायरस जानवरों कभी-कभी दूषित खाने जैसे कच्चे खजूर के रस से, और कभी-कभी एक इंसान से दूसरे इंसान में फैलता है और एक बार जब यह इंसानों में फैल जाता है, तो यह बहुत तेज़ी से जानलेवा हो सकता है। डॉक्टरों के अनुसार निपाह वायरस का इन्क्यूबेशन पीरियड (Incubation Period) यानी शरीर में जाने के बाद लक्षण दिखने का समय 4 दिन से लेकर 45 दिन तक हो सकता है। इसी “शांत अवधि” को सबसे ज़्यादा खतरनाक माना जाता है।

निपाह वायरस क्या है?
निपाह वायरस एक जानलेवा ज़ूनोटिक वायरस है, जो जानवरों से इंसानों में फैलता है। इसका मुख्य स्रोत फल खाने वाले चमगादड़, संक्रमित सूअर, संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आना है। डॉक्टर बताते हैं कि वायरस शरीर में धीरे-धीरे बढ़ता है। शुरुआत में इम्यून सिस्टम इसे पहचान नहीं पाता इस दौरान व्यक्ति पूरी तरह सामान्य महसूस करता है। इसी वजह से इसे Silent Killer कहा जाता है।
साइलेंट पीरियड क्यों है इतना खतरनाक?
यह बिना लक्षण व्यक्ति दूसरों को संक्रमित कर सकता है। जब व्यक्ति काम पर जाता है परिवार और समाज के संपर्क में रहता है तो वायरस चुपचाप फैलता रहता है। बुखार, सिरदर्द जैसे हल्के लक्षण को लोग इग्नोर कर देते हैं, जब तक गंभीर लक्षण आते हैं, तब तक स्थिति बिगड़ चुकी होती है

अचानक गंभीर लक्षण
साइलेंट पीरियड के बाद तेज बुखार, उल्टी, सांस लेने में दिक्कत, दिमाग में सूजन (Encephalitis), बेहोशी या कोमा कई मामलों में मौत का खतरा बहुत ज़्यादाहो जाता है।निपाह वायरस के शुरुआती लक्षण बुखार, सिरदर्द, थकान, मांसपेशियों में दर्द है। इसके गंभीर लक्षण मानसिक भ्रम, दौरे, सांस फूलना और बेहोशी है।
बचाव ही सबसे बड़ा इलाज
निपाह वायरस का कोई पक्का इलाज या वैक्सीन नहीं है, इसलिए सावधानी बेहद ज़रूरी है। ऐसे में कच्चे/गिरे हुए फल न खाएं। फल अच्छे से धोकर ही खाएं। बीमार व्यक्ति से दूरी रखें। बुखार के साथ न्यूरोलॉजिकल लक्षण हों तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। संदिग्ध संपर्क में आए हों तो 45 दिन तक निगरानी ज़रूरी। डॉक्टरों की चेतावनी निपाह वायरस का सबसे खतरनाक पहलू इसका लंबा इन्क्यूबेशन पीरियड है। जब तक लक्षण दिखते हैं, तब तक संक्रमण फैल चुका होता है। निपाह वायरस की 45 दिन तक की साइलेंट अवधि इसे बेहद खतरनाक बनाती है। जागरूकता, जल्दी पहचान और सावधानी ही इससे बचने का सबसे असरदार तरीका है।