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निर्भया की मां ने खड़े किए कई सवाल, कहा-सिस्टम दोषी, हम जिम्मेदार

  • Edited By Janvi Bithal,
  • Updated: 12 Oct, 2020 06:45 PM
निर्भया की मां ने खड़े किए कई सवाल, कहा-सिस्टम दोषी, हम जिम्मेदार

हाल ही में हुए हाथरस केस ने सब के मन में बहुत से सवाल उठा दिए हैं। लोग सरकारों के साथ-साथ देश के सिस्टम पर भी लगातार सवाल उठा रहे हैं। इस बात से तो कोई इंकार नहीं कर सकता कि देश में महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध को रोकने के लिए अब सख्त कदम उठाने की जरूरत है। इसके लिए सरकार भी सतर्क हो गई है और इसी के मद्देनजर हाल ही में गृह मंत्रालय की तरफ से महिला सुरक्षा को लेकर गाइडलाइन भी जारी की गई थी। 

इस केस ने एक बार फिर से निर्भया केस की वो रात याद करवा दी है जब एक बेकसूर बेटी दरिंदगी का शिकार हुई थीं। सालों बीत गए हैं लेकिन हालात अभी भी वैसे ही हैं और इसी सिस्टम पर नारी पंजाब केसरी ने निर्भया की मां आशा देवी के साथ खास बात चीत की और उनसे महिला सुरक्षा को लेकर भी सवाल किए। आपको बता दें कि देश में महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध को देखते हुए नारी पंजाब केसरी की तरफ से एक मुहिम #insaafkimuhim भी चलाई जा रही है।

सवाल: करीब 8 साल हो गए निर्भया के केस को लेकिन शायद अभी तक कोई बदलाव नहीं आया?

इस सवाल के जवाब पर आशा देवी कहती हैं ,' जी मुझे भी यही लगता है कि हम आज भी 2012 में ही खड़े हैं। रोजाना बेटियों के साथ गैंगरेप हो रहे हैं, बलात्कार हो रहे हैं और यह कहीं न कहीं हमारी सरकार पर हमारे सिस्टम पर और हमारे खुद के समाज पर एक तमाचा है। हमें इस पर सच में विचार करने की जरूरत है। सरकार को हमारी व्यवस्था को इस पर सोचने की जरूरत है। आज भी जब भी क्राइम होता है तो घूम फिर कर फिर उस बच्ची पर ही आ जाता है कि उसी की गलती होगी। 2012 में जो निर्भया के साथ हुआ उसमें भी निर्भया को दोषी ठहराया गया था और आज भी हाथरस केस में उस लड़की को दोषी ठहराया जा रहा है। जितना मर्जी बड़ा क्रिमीनल हो लेकिन वो यह कभी नही मानेगी का उसने किसी के साथ गलत किया है। 2012 के बाद लड़कियों के साथ लगातार घिनौना क्राइम हो रहा है तो कहीं न कहीं यह हमारे सिस्टम की हार है। 

सवाल: इस केस के अलावा ऐसे कईं और मामले हैं जो शर्म की वजह से सामने नहीं आ पाते

जवाब: हां इसे छोड़कर भी बहुत से केस हैं जिनकी रिपोर्ट ही नहीं होती है। बदनामी की वजह से लोग रिपोर्ट नहीं करवाते लेकिन आज की बदनामी , आज का संघर्ष हमें जीने लायक रखेगा। हर अपराध के लिए महिला ही क्यों? दहेज नहीं मिला तो औरत को जला दो, कोई रंजिश है तो छोटी बच्ची को पकड़ लो। इन मुजरिमों को कभी बेल नहीं मिलनी चाहिए। 

सवाल: लोगों की मानसिकता बदलने के लिए क्या कदम उठाने चाहिए?

ऐसे लोगों की जुबान काट देनी चाहिए। छोटी मोटी बात पर भी बच्चियों को टारगेट किया जाता है। इन घटनाओं को देखते हुए पुलिस को अपना रवैया बदलना चाहिए क्योंकि जब तक एक कड़ा कानून नहीं आएगा एक कड़ा संदेश नहीं आएगा तब तक न ही यह चीजें बदलेंगी और न ही लोगों की मानसिकता। हाथरस केस में हुई घटना में सबसे घिनौना हुआ कि बच्ची को जीत जी इंसाफ नहीं मिला और उससे भी घिनौना यह कि रात को ही उसे जला दिया गया। इस चीज को सरकार को व्यवस्था को देखना पड़ेगा कि ऐसा क्यों हो रहा है और क्यों मुजरिम क्राइम भी करता है और सीना चौड़ा करके कहता है कि नहीं लड़की की गलती है। हम तो निर्दोष है हमें गलत फसाया जा रहा है। 

 

सवाल: हमारे देश में तमाम कानून है लेकिन फिर भी महिलाओं के प्रति अपराध रूकने का नाम नही ले रहे हैं। सरकार तो हाथ खड़े कर देती है 2012 में भी निर्भया के साथ दरिंदगी हुई उसके बाद तमाम कानूनों में बदलाव किया गया लेकिन आज भी वहीं स्थिती देखने को मिल रही है। कुछ बदला नहीं है। केस लगातार बढ़ रहे हैं। 

जवाब: हम अपने समाज तक बच्चों तक वो सतर्कता नहीं दे पाए कि यह चीज गलत है। आज भी जो क्राइम करता है उसे गलत नहीं माना जाता है वो किसी न किसी तरह निदोर्ष होता है मासूम होता है। 2012 में भी बहुत से कानून बने, डिबेट हुईं लेकिन जो भी हुआ वह सब कागजों तक ही रह गया। समय से सारी चीजें होनी चाहिए लेकिन यह सब बातों तक सीमित है। हमारा कानून ऐसा हो कि एक समय बाउंड हो और जब भी क्रिमिनल प्रूफ हो गया तो उसे सीधे फांसी की सजा हो। 

सवाल: 2012 में जिस तरीके से निर्भया के साथ हुआ था तब पूरा देश एकजुट हो गया था तमाम आंदोलन किए गए लेकिन फिर भी अपराधियों को कईं सालों के बाद सजा हुई, अगर हर मामले में इस तरीके से होगा तो अपराध लगातार बढ़ेंगे और अपराधी भी खुलेआम घूमेंगे। 

जवाब: यही हो रहा है क्योंकि उन्हें पता है कि उन्हें बचाने वाले बहुत हैं। हमारा कानून ही ऐसा है जिसने उन्हें बचाने के लिए हजार रस्ते दिए हैं। आशा देवी ने एक खबर का हवाला देते हुए आगे कहा ,' क्या हम औरतें सिर्फ घर पर खाना बनाने के लिए रखी हैं। क्या हम बाहर काम न करें? पढ़ाई न करें? आखिर सरकार किसी तरह से महिलाओं को सुरक्षा देगी। समाज तो दोषी है लेकिन उससे बड़ा दोषी हमारा सिस्टम है। सरकारें बदल जाती हैं लेकिन चीजें वहीं की वहीं है। हालात वहीं हैं।

सवाल: माताएं बहनों से अनुरोध है कि अपने हाथों को ही हथियार बना लें। इस पर आप क्या कहना है?

जवाब: देखिए समाज में जब तक हमें पुरूषों का सपोर्ट नहीं मिलेगा तब तक चाहे हम हजार हथियार बना लें लेकिन कुछ नहीं होगा। महिलाएं पुरूषों दोनों की जिम्मेदारी है कि वह इस क्राइम के खिलाफ आवाज उठाए। 

सवाल: अब तो छोटी बच्ची और बुजुर्ग औरतों के साथ भी दरिंदगी हो रही है कैसे इस पर रोक लगेगी?

जवाब: ऐसी सोच वाले लोगों के लिए 3 साल की बच्ची हो या 70 साल की बुजुर्ग हो वो एक चीज है जिसे इस्तेमाल किया और फेंक दिया। उनकी मानसिकता गिर गई है। आए दिन क्राइम हो रहे हैं लेकिन सरकार पर इसका कोई असर नहीं है क्योंकि उनके लिए तो यह एक खबर है जो रोज हो रही है। लेकिन आप ने इनके लिए क्या किया? कानून बनाए और कागजों में रख लिए लेकिन क्यों एक समय निर्धारित नहीं किया जाता कि एक महिला को 6 महीने या साल के अंदर अंदर न्याय मिलना चाहिए। सालों लग जाते हैं यह साबित करने के लिए कि लड़की के साथ अपराध हुआ है। इसके लिए हमारा समाज और हम खुद इसके जिम्मेदार हैं। 

सवाल : उन महिलाओं से आप क्या कहना चाहेंगी जो इस दरिंदगी के बाद भी घर पर चुप होकर बैठ जाती हैं?

जवाब: सबसे पहले तो परिवार की जिम्मेदारी बनती है कि वो महिला को सपोर्ट करें क्योंकि क्राइम को छुपाना ही क्राइम को बढ़ावा देना है। चुप रह कर आप उसे दूसरे के लिए प्रेरित कर देंगी। मैं चाहती तो घर बैठ जाती है लेकिन मैनें आवाज उठा लेकिन हमारा भी वो संघर्ष बेकार गया क्योंकि हम फिर उसी जगह पहुंच जाते हैं। हमारी व्यवस्था ही है जो हमें निराशा देती है लेकिन हमारा अधिकार है कि हम अपने मान सम्मान के लिए लड़े। क्राइम के लिए जरूर आवाज उठाएं अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी क्योंकि आप जितना चुप रहेंगे उतना ही उन लोगों को हैसला मिलेगा। 

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