
नारी डेस्क: कैंसर के इलाज के लिए वैज्ञानिक एक नया और अनोखा तरीका विकसित कर रहे हैं। इस तकनीक में बैक्टीरिया (सूक्ष्मजीव) की मदद से ट्यूमर को अंदर से खत्म करने की कोशिश की जा रही है। यह तरीका खासतौर पर उन ट्यूमर पर काम करता है जिनके अंदर ऑक्सीजन की मात्रा बहुत कम होती है। कई ठोस (Solid) ट्यूमर के बीच का हिस्सा ऑक्सीजन-रहित होता है, जो कुछ खास बैक्टीरिया के लिए बढ़ने का आदर्श वातावरण बनाता है।
किस बैक्टीरिया का हो रहा है इस्तेमाल?
इस रिसर्च में वैज्ञानिक Clostridium sporogenes नाम के बैक्टीरिया का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह एक ऐसा बैक्टीरिया है जो मिट्टी में पाया जाता है और सिर्फ ऑक्सीजन-फ्री (बिना ऑक्सीजन) माहौल में ही जिंदा रह सकता है। ट्यूमर के अंदर का हिस्सा मरी हुई कोशिकाओं से बना होता है और वहां ऑक्सीजन बहुत कम होती है। ऐसे में यह बैक्टीरिया वहां पनपता है, पोषक तत्वों को खाता है और धीरे-धीरे ट्यूमर को अंदर से तोड़ना शुरू कर देता है।
सबसे बड़ी चुनौती क्या थी?
समस्या तब आती है जब बैक्टीरिया ट्यूमर के बाहरी हिस्से की तरफ बढ़ते हैं। वहां ऑक्सीजन मौजूद होती है, जिससे बैक्टीरिया मरने लगते हैं। इससे कैंसर को पूरी तरह खत्म करने की उनकी क्षमता कम हो जाती है। इस चुनौती से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने बैक्टीरिया में जेनेटिक बदलाव (Genetic Modification) किया। उन्होंने एक दूसरे बैक्टीरिया से ऐसा जीन निकाला जो ऑक्सीजन को सहन कर सकता है, और उसे इसमें जोड़ दिया। इस बदलाव के बाद मॉडिफाइड बैक्टीरिया ट्यूमर के बाहरी हिस्सों में भी ज्यादा देर तक जिंदा रह पाते हैं।
‘कोरम सेंसिंग’ तकनीक क्या है?
अब सवाल था कि बैक्टीरिया को ऑक्सीजन सहने की ताकत कब दी जाए? इसके लिए वैज्ञानिकों ने बैक्टीरिया के एक नेचुरल कम्युनिकेशन सिस्टम का इस्तेमाल किया, जिसे Quorum Sensing (कोरम सेंसिंग) कहते हैं। जब बैक्टीरिया की संख्या बढ़ती है, तो वे खास केमिकल सिग्नल छोड़ते हैं। जब उनकी संख्या एक तय स्तर तक पहुंच जाती है, तो यह सिग्नल इतना मजबूत हो जाता है कि ऑक्सीजन-सहन करने वाला जीन एक्टिव हो जाता है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि बैक्टीरिया सिर्फ ट्यूमर के अंदर ही सक्रिय रहें और शरीर के स्वस्थ हिस्सों को नुकसान न पहुंचाएं।
‘डीएनए सर्किट’ क्या है?
वैज्ञानिक इस पूरी प्रक्रिया को एक DNA Circuit की तरह समझाते हैं। जैसे किसी इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम में हर पार्ट का एक खास काम होता है, वैसे ही यहां हर जीन और सिग्नल का अपना रोल है। पहले किए गए प्रयोगों में वैज्ञानिक बैक्टीरिया को ऑक्सीजन में जिंदा रहने के लिए री-प्रोग्राम करने में सफल रहे हैं।
उन्होंने फ्लोरोसेंट मार्कर (चमकने वाले मार्कर) की मदद से यह तय किया कि जीन कब और कैसे एक्टिव होगा।
आगे क्या होगा?
अब रिसर्च का अगला चरण यह है कि ऑक्सीजन-टॉलरेंस जीन और कोरम-सेंसिंग सिस्टम को एक ही बैक्टीरिया में जोड़कर उसका प्री-क्लिनिकल ट्रायल किया जाएगा। अगर यह प्रयोग सफल होता है, तो भविष्य में कैंसर के इलाज का यह तरीका बेहद असरदार और कम साइड इफेक्ट वाला विकल्प साबित हो सकता है।
यह तकनीक कैंसर इलाज में एक बड़ा बदलाव ला सकती है। माइक्रोब्स की मदद से ट्यूमर को अंदर से खत्म करने का यह तरीका आने वाले समय में नई उम्मीद बन सकता है।