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रात में क्यों नहीं करते अंतिम संस्कार? जानिए पीछे की धार्मिक वजह

  • Edited By Priya Yadav,
  • Updated: 25 Feb, 2026 05:23 PM
रात में क्यों नहीं करते अंतिम संस्कार? जानिए पीछे की धार्मिक वजह

 नारी डेस्क: मृत्यु सुनते ही दिल पर एक गहरा असर होता है। घर में किसी अपने का निधन होने पर समय जैसे थम सा जाता है। रोते-बिलखते लोग, मंत्रोच्चार, सफेद कपड़े में लिपटा शव यह सब दृश्य बहुत भावनात्मक होते हैं। हिंदू परंपरा में अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु सूर्यास्त के बाद हो जाए तो अंतिम संस्कार अगले दिन सुबह तक टाल दिया जाता है। यह लंबे समय से चली आ रही परंपरा का हिस्सा है। लेकिन सवाल उठता है  आखिर रात में शव को क्यों नहीं जलाया जाता और इसे अकेला क्यों नहीं छोड़ा जाता? इसका उत्तर गरुड़ पुराण में विस्तार से मिलता है।

सूर्यास्त के बाद अंतिम संस्कार क्यों वर्जित है?

गरुड़ पुराण के अनुसार रात का समय तमोगुणी शक्तियों का होता है। अंधेरा बढ़ने के साथ नकारात्मक ऊर्जा सक्रिय मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि यदि शव को रात में अकेला छोड़ा जाए या दाह संस्कार किया जाए, तो यह आत्मा की यात्रा में बाधा डाल सकता है। ग्रामीण इलाकों में आज भी यह परंपरा सख्ती से निभाई जाती है। बुजुर्ग कहते हैं कि सुबह की पहली किरण शुभ मानी जाती है। इसी समय अंतिम संस्कार करना आत्मा की शांति के लिए उचित माना जाता है। यह केवल धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि सामाजिक अनुशासन का भी हिस्सा है।

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ज्योतिष और पंचक काल का महत्व

हिंदू ज्योतिष शास्त्र में पंचक काल को अशुभ माना गया है। यदि इस समय मृत्यु होती है, तो विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। कई परिवार अंतिम संस्कार से पहले पंडित की सलाह लेते हैं, ताकि कोई कठिनाई न आए। शहरी जीवन में इन परंपराओं का पालन थोड़ा लचीला हो गया है, लेकिन कई परिवार अब भी परंपरा और पंडित की सलाह के अनुसार ही अंतिम संस्कार करते हैं।

व्यावहारिक कारण भी हैं

इस परंपरा के पीछे सिर्फ आध्यात्मिक कारण ही नहीं हैं। कुछ व्यावहारिक कारण भी जुड़े हैं मृत्यु के कुछ घंटे बाद शरीर में परिवर्तन शुरू हो जाते हैं। गांवों में खुले आंगन या कच्चे घरों में जानवरों का खतरा होता था। रात भर परिवार का कोई सदस्य शव के पास बैठकर सुरक्षा और वातावरण को साफ-सुथरा रखने का काम करता था। धूप, अगरबत्ती या दीपक जलाकर माहौल को सकारात्मक रखा जाता था। इस तरह यह परंपरा धीरे-धीरे धार्मिक आस्था का रूप ले गई।

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आत्मा और मोह की धारणा

धार्मिक मान्यता के अनुसार, मृत्यु के तुरंत बाद आत्मा अपने परिवार और घर के आसपास रहती है। उसे अपने शरीर और प्रियजनों से मोह होता है। अगर शव को अकेला छोड़ दिया जाए, तो यह आत्मा के लिए पीड़ादायक माना जाता है। कई परिवारों में रात भर भजन और मंत्रोच्चार किए जाते हैं। यह डर नहीं, बल्कि स्नेह, सम्मान और आत्मा की शांति का प्रतीक है।

बदलती समय और आधुनिक परिप्रेक्ष्य

आज के आधुनिक अस्पतालों और विद्युत शवदाह गृहों में 24 घंटे अंतिम संस्कार की सुविधा उपलब्ध है। शहरों में लोग समय के हिसाब से अंतिम संस्कार कर सकते हैं। फिर भी, परंपरा और आस्था का प्रभाव कम नहीं हुआ है। युवा पीढ़ी सवाल पूछती है, तर्क खोजती है, लेकिन जब घर में ऐसी स्थिति आती है, तो परिवार परंपरा का पालन करता है। यह नियम सिर्फ विधि नहीं, बल्कि विदाई का भावनात्मक तरीका भी है। शव को रात में अकेला न छोड़ने की परंपरा धार्मिक, सामाजिक और व्यावहारिक कारणों का मिश्रण है। इसे अंधविश्वास कहकर खारिज करना आसान है, लेकिन इसके पीछे पीढ़ियों का अनुभव, सुरक्षा और आत्मा के प्रति सम्मान जुड़ा हुआ है।
 

 

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