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20 नवंबर की मनहूस रात कभी नहीं भूल पाया भारत, टूटा लोहा काल बना और नींद में ही सो गई 150 जिंदगियां

  • Edited By Monika,
  • Updated: 20 Nov, 2025 03:51 PM
20 नवंबर की मनहूस रात कभी नहीं भूल पाया भारत, टूटा लोहा काल बना और नींद में ही सो गई 150 जिंदगियां

नारी डेस्क : भारत के इतिहास में 20 नवंबर 2016 का दिन हमेशा एक दर्दनाक याद के रूप में दर्ज रहेगा। उसी दिन देश ने एक ऐसे रेल हादसे का सामना किया, जिसने लाखों लोगों को झकझोर कर रख दिया। इंदौर–पटना एक्सप्रेस (19321) जब कानपुर देहात के पुखरायां से गुजर रही थी, तभी अचानक एक कोच का टूटा हुआ धातु का हिस्सा मौत बनकर सामने आया। कुछ ही सेकंड में 14 बोगियां पटरी से उलट-पुलट हो गईं। इस भीषण हादसे में 150 से ज्यादा लोगों की मौके पर ही जान चली गई, जबकि सैकड़ों यात्री गंभीर रूप से घायल हुए। यह घटना आज भी लोगों की आंखें नम कर देती है और भारतीय रेल इतिहास की सबसे दर्दनाक त्रासदियों में से एक मानी जाती है।

कैसे हुआ हादसा?

रात करीब 3 बजे, 20 नवंबर की ठंडी रात में इंदौर से पटना जा रही ट्रेन झांसी–कानपुर रूट पर 106 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ रही थी, जब अचानक एस-1 कोच की वेल्डिंग का एक जंग लगा टुकड़ा टूटकर पटरी पर गिर गया। पटरी में फंसा यह हिस्सा इतना घातक साबित हुआ कि कोच उछलकर पटरी से उतर गया और उसके साथ एस-2 सहित कुल 14 बोगियां डिरेल हो गईं। ज्यादातर यात्री गहरी नींद में थे, कंबल ओढ़े हुए, और तेज झटके से कई लोग हवा में उछलकर छत से टकराए। कुछ ही सेकंड में कोचों में चीख-पुकार गूंजने लगी और पूरी बोगी मलबे में बदल गई।

सबसे ज्यादा मौतें किन कोचों में हुईं?

रिपोर्ट में सामने आया कि सबसे ज्यादा मौतें एस–1 और एस–2 स्लीपर कोच में हुईं, जहां हादसे के समय ज्यादातर यात्री गहरी नींद में थे। दुर्घटना के तुरंत बाद आसपास के ग्रामीण मौके पर पहुंचे और राहत–कार्य शुरू किया, लेकिन अधिकांश लोग भारी मलबे में फंसे होने के कारण उन्हें निकालना बेहद कठिन था। बाद में NDRF, रेलवे की मेडिकल यूनिट्स और स्थानीय पुलिस ने बड़े पैमाने पर रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया। ट्रेन में अधिकतर यात्री मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार के थे, जो दिवाली और छठ मनाकर अपने काम पर वापस लौट रहे थे।

जांच में क्या सामने आया?

हादसे की जांच रेलवे सुरक्षा आयुक्त (CRS) को सौंपी गई और जारी रिपोर्ट में साफ लिखा गया कि यह दुर्घटना पूरी तरह मैकेनिकल फेलियर का नतीजा थी। जांच में पाया गया कि एस-1 कोच की वेल्डिंग पुरानी दरारों और जंग लगने के कारण कमजोर हो चुकी थी, जो टूटकर पटरी में फंस गई और इसी से डिरेलमेंट हुआ। रिपोर्ट ने ट्रैक फ्रैक्चर की थ्योरी को पूरी तरह खारिज किया, क्योंकि उसी पटरी से हादसे से कुछ घंटे पहले चार ट्रेनें बिना किसी समस्या के गुजर चुकी थीं।

हादसों को रोकने के लिए रेलवे की बड़ी पहल

हादसे के बाद रेलवे ने सुरक्षा को लेकर कई बड़े कदम उठाए।
कवच’ सिस्टम लागू: स्वदेशी एंटी-कोलिजन सिस्टम, ट्रेनें खुद-ब-खुद खतरे में रुक जाती हैं तेज रफ्तार, गलत सिग्नल और टक्कर की स्थिति में ऑटो ब्रेक और 10,000 KM रूट पर लागू, 2025–30 तक पूरे नेटवर्क का लक्ष्य।
टेक्नोलॉजी अपग्रेड: ऑटोमैटिक ब्लॉक सिग्नलिंग, इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग, ड्रोन और AI आधारित ट्रैक मॉनिटरिंग और अल्ट्रासोनिक फ्रैक्चर डिटेक्शन।
सुरक्षित कोच: पुरानी ICF कोचों की जगह LHB कोच, डिरेलमेंट होने पर भी कम जानहानि।
लोको पायलट सुरक्षा: AC केबिन, बेहतर सीट, एंटी–फटीग सिस्टम और आग लगने पर तुरंत अलर्ट देने वाली FDS प्रणाली।

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