नारी डेस्क: हाथी पांव बीमारी, जिसे मेडिकल भाषा में फाइलेरियासिस कहा जाता है, एक गंभीर लेकिन धीरे-धीरे बढ़ने वाली बीमारी है। इसमें शरीर के किसी हिस्से खासतौर पर पैरों में असामान्य सूजन आने लगती है। समय के साथ यह सूजन इतनी ज़्यादा हो सकती है कि पैर मोटा, सख़्त और खुरदुरा दिखने लगता है, जिस वजह से इसे आम बोलचाल में “हाथी पांव” कहा जाता है। इस लेख में हम जानेंगे कि यह बीमारी क्यों होती है, इसके लक्षण क्या हैं और इससे बचाव कैसे किया जा सकता है।
हाथी पांव बीमारी कैसे होती है?
हाथी पांव बीमारी मच्छरों के काटने से फैलती है। जब कोई मच्छर संक्रमित व्यक्ति को काटता है और फिर किसी स्वस्थ व्यक्ति को काटता है, तो परजीवी कीड़े (फाइलेरिया) शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। ये कीड़े लसीका तंत्र (Lymphatic System) में जाकर ब्लॉक कर देते हैं, जिससे शरीर में तरल पदार्थ जमा होने लगता है और सूजन बढ़ती है।

हाथी पांव बीमारी में क्या लक्षण दिखते हैं?
शुरुआत में लक्षण स्पष्ट नहीं होते। कई बार संक्रमण के बाद सालों तक कोई परेशानी नहीं दिखती। जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, पैर, हाथ, छाती और जननांग सूजने लगते हैं। सूजन वाले हिस्से की त्वचा मोटी, खुरदरी और सख्त हो जाती है। दर्द, बेचैनी और बुखार जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं। बार-बार बैक्टीरियल संक्रमण होने पर स्थिति और गंभीर हो सकती है। लंबे समय तक इलाज न होने पर व्यक्ति की चलने-फिरने और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
क्यों कहा जाता है इसे “हाथी पांव”?
इस बीमारी में पैरों की सूजन इतनी अधिक हो जाती है कि पैर हाथी के पैर जैसे भारी और मोटे दिखने लगते हैं। यही कारण है कि इसे आम भाषा में हाथी पांव कहा जाता है।

इस बीमारी का खतरा कितना बड़ा है?
दुनिया में करीब 12 करोड़ लोग हाथी पांव बीमारी से प्रभावित हैं। यह बीमारी उन इलाकों में अधिक पाई जाती है, जहां स्वच्छता की स्थिति खराब हो और मच्छरों का प्रकोप अधिक हो। भारत के कई राज्यों में यह अब भी बड़ी चिंता का विषय है।
इलाज और रोकथाम
कोई स्थायी इलाज या टीका अभी उपलब्ध नहीं है। एंटी-पैरासिटिक दवाएं शरीर में मौजूद कीड़ों को खत्म करने में मदद करती हैं और संक्रमण को फैलने से रोकती हैं। कुछ मामलों में सूजन कम करने या हाइड्रोसील जैसी समस्या के लिए सर्जरी की जाती है। स्वच्छता बनाए रखना और मच्छर नियंत्रण इस बीमारी को रोकने में मदद कर सकता है।
हाथी पांव बीमारी धीरे-धीरे विकसित होने वाली और गंभीर हो सकने वाली बीमारी है। समय पर इलाज और साफ-सफाई के उपाय से इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है।