नारी डेस्क: आज के डिजिटल दौर में बच्चों को चुप कराने या बहलाने के लिए मोबाइल स्क्रीन सबसे आसान “ट्रिक” बन गई है। लेकिन एक्सपर्ट्स इसे “Screen Bribe Trap” कहते हैं एक ऐसा जाल जिसमें फंसकर माता-पिता अनजाने में अपने टॉडलर्स (1–3 साल)से बहुत कुछ छीन रहे हैं। आइए समझते हैं इसके बारे में विस्तार से।
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“स्क्रीन ब्राइब ट्रैप” क्या है?
जब बच्चा रोए, खाना न खाए या ज़िद करे और उसे शांत करने के लिए मोबाइल/टैबलेट पकड़ा दिया जाए, तो यह रिश्वत की तरह स्क्रीन देना कहलाता है। इससे बच्चा धीरे-धीरे हर काम के बदले स्क्रीन की उम्मीद करने लगता है। स्क्रीन तुरंत शांति देती है, लेकिन लंबे समय में यह बच्चे से भाषा, धैर्य, रिश्ते और बचपन छीन लेती है। टॉडलर को स्क्रीन नहीं, आपका समय और ध्यान सबसे ज्यादा चाहिए।
माता-पिता टॉडलर्स का इस तरह कर रहे हैं नुकसान
बोलने और भाषा सीखने की क्षमता: स्क्रीन एकतरफा होती है, बातचीत नहीं बच्चा शब्द सुनता है, लेकिन बोलने का अभ्यास नहीं कर पाता। इससे स्पीच डिले का खतरा बढ़ता है
धैर्य और भावनात्मक नियंत्रण: हर बार रोने पर स्क्रीन मिलने से बच्चा गुस्सा, बोरियत और इंतज़ार करना सीख ही नहीं पाता
माता-पिता से जुड़ाव (Bonding Time): कहानी, गाना, खेल सब स्क्रीन से बदल जाता है, आंखों का संपर्क और अपनापन कम हो जाता है।
क्रिएटिविटी और कल्पनाशक्ति: स्क्रीन रेडी-मेड विजुअल देती है। बच्चे का दिमाग खुद से सोचने, कल्पना करने से वंचित रह जाता है
शारीरिक एक्टिविटी: बैठकर स्क्रीन देखने से मोटर स्किल्स और फिजिकल डेवलपमेंट प्रभावित होता है
अच्छी नींद: स्क्रीन की नीली रोशनी मेलाटोनिन हार्मोन को बिगाड़ती है। बच्चों की नींद उथली और बेचैन हो जाती है
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एक्सपर्ट्स की सलाह
2 साल से कम उम्र के बच्चे को स्क्रीन बिल्कुल नहीं दे। 2 से 5 साल के बच्चे को अगर फोन देना भी है तो दिन में 1 घंटे से कम ही दें, वो भी पैरेंट के साथ। स्क्रीन को कभी इनाम या सज़ा न बनाएं। बेहतर होगा कि इसकी जगह बच्चे को किताबें, पिक्चर बुक्स, ब्लॉक्स, पज़ल, गेंद दें।