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आखिर बसंत पंचमी पर हजरत निजामुद्दीन दरगाह पर पीली चादर क्यों चढ़ाई जाती है?

  • Edited By Monika,
  • Updated: 23 Jan, 2026 12:44 PM
आखिर बसंत पंचमी पर हजरत निजामुद्दीन दरगाह पर पीली चादर क्यों चढ़ाई जाती है?

नारी डेस्क : देशभर में बसंत पंचमी का पर्व पूरे उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। चारों ओर पीले रंग की छटा, सरसों के फूल, पतंगें और बसंत की रौनक दिखाई दे रही है। यह पर्व केवल ऋतु परिवर्तन का प्रतीक नहीं, बल्कि भारत की साझा संस्कृति और गंगा-जमुनी तहजीब का भी सशक्त उदाहरण है। बसंत पंचमी को जहां हिंदू समाज मां सरस्वती की पूजा करता है, वहीं मुस्लिम समुदाय भी इस दिन को श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाता है। खास तौर पर दिल्ली की हजरत निजामुद्दीन औलिया दरगाह और जामा मस्जिद में इस अवसर पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। सवाल उठता है कि आखिर इस्लामी सूफी परंपरा में बसंत पंचमी और पीले रंग का क्या महत्व है?

मां सरस्वती और बसंत पंचमी का महत्व

बसंत पंचमी का त्योहार ज्ञान, विद्या, कला और संगीत की देवी मां सरस्वती को समर्पित होता है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है। इस दिन पीले वस्त्र पहनने और पीले फूल अर्पित करने की परंपरा है, क्योंकि पीला रंग बसंत, ऊर्जा, समृद्धि और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। हालांकि यह पर्व मूल रूप से हिंदू धर्म से जुड़ा है, लेकिन भारत की सांस्कृतिक विविधता के कारण इसकी खुशबू धर्म की सीमाओं से आगे बढ़ चुकी है।

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800 साल पुरानी परंपरा का इतिहास

बसंत पंचमी के दिन हजरत निजामुद्दीन औलिया दरगाह पीले रंग में रंग जाती है। यहां पीली चादर चढ़ाई जाती है, सूफी कव्वालियां गूंजती हैं और हर धर्म के लोग एक साथ इस उत्सव में शामिल होते हैं। यह परंपरा लगभग 800 साल पुरानी है और इसकी जड़ें सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया और उनके प्रिय शिष्य अमीर खुसरो से जुड़ी हैं।

शोक में डूबे थे हजरत निजामुद्दीन औलिया

इतिहासकारों के अनुसार, 13वीं-14वीं शताब्दी के दौरान हजरत निजामुद्दीन औलिया अपने बेहद प्रिय भतीजे के निधन से गहरे शोक में डूब गए थे। वे न किसी से बातचीत करते थे और न ही सामान्य जीवन में रुचि ले रहे थे। अपने गुरु की यह अवस्था देखकर अमीर खुसरो बेहद चिंतित हो गए। वे किसी भी तरह अपने गुरु के चेहरे पर मुस्कान लौटाना चाहते थे, लेकिन कोई उपाय समझ नहीं आ रहा था।

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अमीर खुसरो की अनोखी पहल

बसंत पंचमी के दिन अमीर खुसरो ने कुछ महिलाओं को पीले वस्त्र पहने और पीले फूल हाथ में लिए देखा। पूछने पर महिलाओं ने बताया कि वे ज्ञान की देवी मां सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए यह सब कर रही हैं। यह बात अमीर खुसरो के मन को छू गई। उन्होंने सोचा कि जिस तरह पीला रंग लोगों के जीवन में खुशी और उल्लास भरता है, वैसे ही यह उनके गुरु के दुख को भी कम कर सकता है।

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पीले फूलों से लौटी मुस्कान

अमीर खुसरो ने स्वयं पीले वस्त्र पहने, हाथ में सरसों के पीले फूल लिए और अपने गुरु हजरत निजामुद्दीन औलिया के सामने पहुंचे। जैसे ही हजरत निजामुद्दीन ने अपने प्रिय शिष्य को इस रूप में देखा, उनके चेहरे पर लंबे समय बाद मुस्कान आ गई। यही वह क्षण था, जिसने इतिहास रच दिया। उसी दिन से बसंत पंचमी के अवसर पर ‘सूफी बसंत’ मनाने की परंपरा शुरू हुई।

सूफी बसंत: गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल

आज भी बसंत पंचमी के दिन हजरत निजामुद्दीन दरगाह में सूफी बसंत का आयोजन होता है। इस अवसर पर पीली चादर चढ़ाई जाती है, सूफी संगीत और कव्वालियों के माध्यम से प्रेम, करुणा और भाईचारे का संदेश दिया जाता है। इस आयोजन की सबसे खास बात यह है कि इसमें केवल मुस्लिम समुदाय ही नहीं, बल्कि हिंदू, सिख, ईसाई और अन्य धर्मों के लोग भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।

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धर्म से ऊपर इंसानियत का संदेश

सूफी बसंत हमें यह सिखाता है कि आस्था का मूल उद्देश्य प्रेम और मानवता है। यह परंपरा धर्मों के बीच सेतु बनाती है और बताती है कि भारतीय संस्कृति में उत्सव केवल पूजा नहीं, बल्कि साझा खुशियों का उत्सव होता है। यही वजह है कि बसंत पंचमी पर हजरत निजामुद्दीन दरगाह पर चढ़ाई जाने वाली पीली चादर आज भी भारत की गंगा-जमुनी तहजीब की सबसे खूबसूरत पहचान बनी हुई है।
 

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