नारी डेस्क: हर साल की तरह इस साल भी बसंत का त्योहार, यानी बसंत पंचमी, निज़ामुद्दीन की गलियों और दरगाह के दरवाज़ों पर एक नई ताजगी लेकर आता है। सात सौ साल पहले ख्वाजा आमिर ख़ुस्रू ने अपने पीर, हजरत निज़ामुद्दीन औलिया, के दरवाज़े पर बसंत का स्वागत किया था गेंदा फूल, सरसों के फूल और संगीत के संग।
आज भी वह जादुई पल जीवित है। बसंत पंचमी पर यहां Qawwali की मधुर धुनें गूंजती हैं, गलियां पीले फूलों से भर जाती हैं, और श्रद्धा का रंग कविता, ताल और संगीत में घुल जाता है। यह सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि एक जीवित परंपरा है, जिसे हर साल बसंत के आगमन पर अनुभव किया जा सकता है।
गलियों में गूंजती क़व्वालियां
निज़ामुद्दीन बस्ती की गलियां उस दिन जीवित हो उठती हैं। Qawwals अपनी मधुर आवाज़ और ताल के साथ गीत गाते हैं, और हर कदम पर बसंत का जश्न महसूस होता है। यह अनुभव सिर्फ सुनने का नहीं, बल्कि महसूस करने वाला है—जहां संगीत और श्रद्धा मिलकर एक अद्भुत माहौल बनाते हैं।
दरगाह में संगीत और भक्ति का संगम
दरगाह के अंदर कदम रखते ही हारमोनियम, तबला और ढोल की आवाज़ें वातावरण में घुल जाती हैं। भक्त फूल और चादर चढ़ाते हैं, और क़व्वालियों की लय में नज़रें झुकी रहती हैं। यह पल भक्त और कलाकार दोनों के लिए एक आध्यात्मिक अनुभव है, जहां हर ताल और सुर दिल को स्पर्श करता है।
फूल और चादर अर्पित करना
बसंत पंचमी पर लोगों का एक खास रिवाज़ है गेंदा और सरसों के फूल चढ़ाना, और चादर अर्पित करना। यह सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि श्रद्धा और प्रेम का प्रतीक है। हर फूल, हर चादर और हर निवेदन यहां की आस्था और सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखता है।
प्रेम, नवीनीकरण और भक्ति की क़व्वालियां
बसंत की क़व्वालियां केवल गीत नहीं होतीं। ये प्रेम, नवीनीकरण और भक्ति के भावों को व्यक्त करती हैं। हर गीत यह याद दिलाता है कि प्रकृति के बदलाव, मौसम का आगमन, और हमारी आस्था, सब एक दूसरे से जुड़े हैं। यह अनुभव साल भर के तनाव और व्यस्त जीवन से दूर एक शांति और आनंद का अहसास देता है।
बसंत पंचमी का यह त्योहार, निज़ामुद्दीन की गलियों और दरगाह में हर साल कुछ घंटे के लिए जीवित हो उठता है। अगर आप चाहते हैं कि बसंत का जादू सिर्फ कहानियों में नहीं, बल्कि अपने दिल में भी बसा रहे तो इस पल को महसूस करना न भूलें।