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25 साल में बहुत कुछ बदला, लेकिन असली बराबरी पाने में अभी लग सकते हैं 250 साल

  • Edited By Priya Yadav,
  • Updated: 08 Mar, 2026 12:24 PM
25 साल में बहुत कुछ बदला, लेकिन असली बराबरी पाने में अभी लग सकते हैं 250 साल

नारी डेस्क:  हर साल 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। यह दिन महिलाओं की उपलब्धियों, उनके संघर्ष और समाज में उनकी भूमिका को सम्मान देने के लिए समर्पित होता है। पिछले करीब 25 सालों में भारत में महिलाओं की स्थिति में कई बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। शिक्षा, रोजगार, राजनीति और तकनीक के क्षेत्र में महिलाओं ने अपनी मजबूत पहचान बनाई है। लेकिन अगर गहराई से देखा जाए तो यह भी सच है कि कई ऐसी सामाजिक सोच और परंपराएं हैं जो आज भी लगभग वैसी ही हैं जैसी पहले हुआ करती थीं। कुछ दरवाजे जरूर खुले हैं, कई नई संभावनाएं भी सामने आई हैं, लेकिन कई दीवारें अभी भी समाज में मजबूती से खड़ी हैं। यही कारण है कि बदलाव की यह यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है।

शिक्षा और करियर में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी

पिछले दो दशकों में महिलाओं ने शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी प्रगति की है। आज भारत में विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) जैसे विषयों में पढ़ाई करने वालों में लगभग 43 प्रतिशत महिलाएं हैं। यह आंकड़ा दुनिया के कई देशों से बेहतर माना जाता है। एक समय ऐसा था जब इंजीनियरिंग कॉलेजों में लड़कियों की संख्या बहुत कम होती थी और उन्हें अलग नजर से देखा जाता था। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। आज वही लड़कियां रिसर्च कर रही हैं, नई तकनीकों पर काम कर रही हैं और बड़ी टेक कंपनियों में महत्वपूर्ण पदों पर पहुंच रही हैं। सिर्फ तकनीकी क्षेत्र ही नहीं, बल्कि पत्रकारिता, सेना, खेल, पुलिस, अंतरिक्ष और कॉरपोरेट सेक्टर में भी महिलाओं की मौजूदगी तेजी से बढ़ी है। आज कई महिलाएं विदेशों में पढ़ाई कर रही हैं, स्टार्टअप शुरू कर रही हैं और बड़े-बड़े व्यवसाय भी चला रही हैं।

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राजनीति में भी मजबूत हुई है महिलाओं की भागीदारी

राजनीति के क्षेत्र में भी महिलाओं की भागीदारी पहले की तुलना में काफी बढ़ी है। खासतौर पर पंचायत स्तर पर महिलाओं की मौजूदगी ने लोकतंत्र को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाई है। आज देश की पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी लगभग 46 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। गांवों की चौपालों में जहां पहले महिलाओं की आवाज बहुत कम सुनाई देती थी, आज वहीं महिलाएं सरपंच और पंच बनकर फैसले ले रही हैं। यह बदलाव ग्रामीण भारत में सामाजिक सोच के धीरे-धीरे बदलने का संकेत देता है।

तकनीक और इंटरनेट ने दी नई ताकत

पिछले कुछ सालों में तकनीक और इंटरनेट ने महिलाओं को नई ताकत दी है। डिजिटल प्लेटफॉर्म ने महिलाओं को अपनी आवाज उठाने और आर्थिक रूप से मजबूत बनने का मौका दिया है। आज कई महिलाएं घर बैठे ऑनलाइन कारोबार चला रही हैं। सोशल मीडिया, डिजिटल मार्केटिंग और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के जरिए वे अपने हुनर को दुनिया तक पहुंचा रही हैं। पहले जहां महिलाओं के लिए आर्थिक स्वतंत्रता हासिल करना मुश्किल माना जाता था, वहीं अब कई महिलाएं खुद अपना व्यवसाय खड़ा कर रही हैं और परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत बना रही हैं।

घरेलू काम का बोझ अब भी महिलाओं पर ज्यादा

हालांकि इतने बदलावों के बावजूद एक सच्चाई यह भी है कि घर के काम की जिम्मेदारी आज भी मुख्य रूप से महिलाओं के कंधों पर ही रहती है। आंकड़ों के मुताबिक भारतीय महिलाएं घरेलू कामों में पुरुषों की तुलना में लगभग 577 प्रतिशत अधिक समय खर्च करती हैं। अगर घर को एक कंपनी मान लिया जाए तो महिलाएं उसमें सीईओ से लेकर कर्मचारी तक हर भूमिका निभाती हैं, लेकिन इसके बदले उन्हें कोई वेतन नहीं मिलता। आज कई महिलाएं नौकरी भी करती हैं, लेकिन ऑफिस से लौटने के बाद घर के काम की दूसरी शिफ्ट भी उन्हें ही संभालनी पड़ती है। यानी उनकी जिम्मेदारियां पहले की तुलना में कम होने के बजाय कई बार और बढ़ गई हैं।

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वर्कप्लेस पर अब भी पूरी बराबरी नहीं

कामकाजी महिलाओं को आज भी कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। भारत में जेंडर पे गैप यानी पुरुषों और महिलाओं की सैलरी के बीच अंतर अब भी लगभग 27 प्रतिशत के आसपास है। इसका मतलब है कि कई जगहों पर एक जैसा काम करने और समान योग्यता होने के बावजूद महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम वेतन मिलता है। इसके अलावा एक और समस्या है जिसे 'ग्लास सीलिंग' कहा जाता है। इसका मतलब है कि महिलाएं अपने करियर में एक स्तर तक तो पहुंच जाती हैं, लेकिन उससे ऊपर के नेतृत्व वाले पदों तक पहुंचना उनके लिए मुश्किल हो जाता है।

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रोजमर्रा की सोच में अब भी मौजूद है असमानता

कई बार असमानता सिर्फ आंकड़ों में नहीं बल्कि रोजमर्रा की सोच और व्यवहार में दिखाई देती है। उदाहरण के तौर पर अगर कोई पुरुष देर तक ऑफिस में काम करता है तो उसे मेहनती कहा जाता है। लेकिन अगर कोई महिला देर तक काम करे तो अक्सर सवाल उठाया जाता है कि वह घर कैसे संभालती होगी। इसी तरह अगर कोई महिला अधिकारी सख्त फैसले लेती है तो उसे कई बार ‘एटीट्यूड वाली’ या ‘कड़क’ कहा जाता है, जबकि पुरुष अधिकारी के लिए यही बात ‘लीडरशिप क्वालिटी’ मानी जाती है। ये छोटी-छोटी सोच और टिप्पणियां समाज में मौजूद उस मानसिकता को दर्शाती हैं जिसे पितृसत्ता कहा जाता है।

सुरक्षा और आजादी के बीच संतुलन की चुनौती

महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा भी आज तक पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। कई घरों में आज भी लड़कियों के लिए अलग नियम बनाए जाते हैं कि उन्हें कितने बजे घर लौटना है, कहां जाना है और किसके साथ जाना है। हालांकि इन नियमों के पीछे अक्सर सुरक्षा का कारण बताया जाता है, लेकिन कई बार यह महिलाओं की आजादी को सीमित भी कर देता है। महिलाओं के खिलाफ अपराधों की रिपोर्टिंग बढ़ी है, जिसे एक तरफ जागरूकता का संकेत माना जाता है, लेकिन यह भी दिखाता है कि समाज में सुरक्षा की चुनौती अब भी मौजूद है।

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बदलाव हुआ है, लेकिन सफर अभी बाकी है

पिछले 25 सालों में महिलाओं के लिए कई नए रास्ते खुले हैं और समाज में बदलाव भी आया है। लेकिन यह बदलाव पूरी तरह से बराबरी में बदलने के लिए अभी लंबा समय ले सकता है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि सामाजिक सोच को पूरी तरह बदलने में अभी कई दशक या शायद दो सौ साल से ज्यादा समय लग सकता है। यही वजह है कि महिला दिवस सिर्फ उपलब्धियों का जश्न मनाने का दिन नहीं है, बल्कि यह याद दिलाने का भी दिन है कि असली बराबरी हासिल करने के लिए समाज को अभी और लंबा सफर तय करना बाकी है। 

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