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लंदन रिटर्न बेटी ने चमका दी पिता की किस्मत, बंद होते बिजनेस में यूं फूंकी जान की अब बरस रहा पैसा ही पैसा

  • Edited By Charanjeet Kaur,
  • Updated: 24 Mar, 2023 12:18 PM
लंदन रिटर्न बेटी ने चमका दी पिता की किस्मत, बंद होते बिजनेस में यूं फूंकी जान की अब बरस रहा पैसा ही पैसा

किसी ने सच ही कहा है कि बेटियां किस्मत वालों को ही नसीब होती है। फिर बेटी जब कल्याणी पांड्य तब तो बात बिल्कुल सटीक बैठती है। कल्याणी ने लंदन में वकालत की पढ़ाई पूरी करने के बाद वडोदरी लौटकर पिता के कारोबार शंकर फार्म फ्रेश में हाथ बंटाने का फैसला लिया, जो कि ऑर्गेनिक आइटम्‍स की बिक्री करती थी। जब कल्याणी ने देखा कि पापा का करोबार कुछ खास नहीं चल रहा है तो इन्हीं आइटम्स में नेचुरल घी कको भी लॉन्च करने का फैसला लिया।  बस इतनी से फेर बदल करते ही उनका बिजनेस चल पड़ा। खुद कल्याणी को आइडिया नहीं था कि उनका घी ब्रांड इतनी तगड़ी रफ्तार पकड़ लेगा। बस फिर क्या था, बस इस ऑर्गेनिक घी की ही इतनी ज्यादा डिमांड बढ़ गई कि एक समय पर बंद होने का कगार पर खड़ी कंपनी ऊंचाईंयों पर पहुंच गई। ये रहना गलत नहीं होगा कि ये सबकुछ कल्याणी के चलते हो पाया। अब कल्याणी सह- संस्थापक के तौर पर कंपनी की देख-रेख करती है।

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लंदन में पोस्‍ट ग्रेजुएशन करने गई थीं कल्याणी

शंकर फार्म फ्रेश की शुरुआत 2012 में हुई थी। विक्रम पांड्या इसके ऑपरेशंस देख र‍हे थे। वह पार्ट-टाइम बिजनसमैन और पार्ट-टाइम किसान थे। ऑर्गेनिक फार्मिंग की बूम से वह काफी उत्‍साहित थे। विक्रम आईआईएम-अहमदाबाद के छात्र थे। गाय पालने के अपने प्यार के कारण उन्‍होंने डेयरी कारोबार में एंट्री का फैसला किया था। वह ऑर्गेनिक डेयरी मॉडल विकसित कर ग्रामीणों की आजीविका में योगदान देना चाहते थे। गायों को पालने वाले परिवार में पले-बढ़े होने के कारण उनके लिए कुछ मवेशियों के साथ इसकी शुरुआत करना आसान था। उन्होंने रिश्तेदारों, दोस्तों और अन्य परिचितों को गाय का दूध और मिल्‍क प्रोडक्‍ट बेचना शुरू किया। लेकिन, एक के बाद एक गलत फैसले कारोबार के लिए भारी पड़ने लगे। करीब 8 साल बाद शंकर फार्म फ्रेश बंद होने के कगार पर खड़ा था। इसकी सबसे बड़ी वजह बढ़ता नुकसान और मवेशियों का मरना था।

जब बिजनेस इस खराब दौर से गुजर रहा था, उस वक्‍त कल्‍याणी लंदन में थीं। वडोदरा से लॉ में ग्रेजुएशन करने के बाद वह लंदन में पोस्‍ट ग्रेजुएशन कर रही थीं। मास्‍टर्स पूरा करने के बाद वह वापस वडोदरा लौटीं। उन्‍होंने एक साल कॉरपोरेट सेक्‍टर में नौकरी भी की। लेकिन वहां मन नहीं लगा तो नौकरी छोड़ दी। सितंबर 2020 में कल्‍याणी ने बिजनेस के ऑपरेशंस पूरी तरह अपने हाथों में ले लिए। उन्‍होंने एक साल के अंदर फर्म को प्रोफिटेबल बना दिया। ऑर्गेनिक ए2 मिल्‍क और घी ऑनलाइन और ऑफलाइन बेचकर यह संभव हुआ। हालांकि, यह इतना असान नहीं था।

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कल्‍याणी ने कारोबार के हर पहलू पर ध्‍यान देना शुरू किया। उन्‍होंने पाया कि कंपनी के प्रोडक्‍ट इस्‍तेमाल करने वाले ग्राहक तो हैं। लेकिन, इसके लिए सेल्‍स और ब्रांडिंग पर बहुत ज्‍यादा खर्च नहीं किया जा रहा है। कुछ और ऐसे एरिया थे जहां सुधार की गुंजाइश थी। कारोबार उस वक्‍त नुकसान में था। लिहाजा, उन्‍होंने हर कमजोर क्षेत्र पर काम करने का फैसला किया। इसी के तहत पहला कदम जो उन्‍होंने उठाया वो था अपने घी की ब्रांडिंग। उन्‍होंने इसे अपने प्रोडक्‍टों की रेंज में भी जोड़ा।

घी बेचने की ऑनलाइन और ऑफलाइन की शुरुआत

कल्‍याणी ने अमेजन और दूसरे रिटेल स्‍टोरों पर ब्रांडेड घी की बिक्री शुरू की। ऑनलाइन ऐड भी चलाए। कारोबार में उनका हाथ लगने से प्रोडक्‍ट के मार्केट में आने तक में करीब डेढ़ साल का वक्‍त लगा। कल्‍याणी ने एहसास किया कि उनकी ऐसे सही वक्‍त पर मार्केट में एंट्री हुई है जब हर कोई कोरोना की महामारी के कारण ऑर्गेनिक प्रोडक्‍टों की तलाश में है। पैकेजिंग और ब्रांड की पोजिशनिंग करके मार्केट में दूसरे ब्रांडों से उनके घी ने अलग जगह बनाई। उन्‍हें शानदार रेस्‍पॉन्‍स मिला। कल्‍याणी को समझ आ गया था कि फर्म सबकुछ ठीक कर रही थी। बस उससे सिर्फ एक ही गलती हुई थी। उसने घी की ब्रांडिंग नहीं की थी।

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इसी ने सारा फर्क पैदा कर दिया। एक कदम और कल्‍याणी ने यह उठाया कि उन्‍होंने गायों की लैब टेस्टिंग कराई ताकि उन्‍हें ए2 सर्टिफाई किया सके। ए2 का सर्टिफिकेशन देसी गायों को मिलता है। अध्‍ययनों के मुताबिक, ऐसी गायों का घी ज्‍यादा बेहतर क्‍वालिटी का माना जाता है। ए1 कैटेगरी में पश्चिमी नस्‍ल की गाय आती हैं। इनमें जर्सी, होल्‍सटीन जैसी नस्लें शामिल हैं। कैटेगराइजेशन के लिए गायों के ब्‍लड टेस्‍ट सैंपल लिए जाते हैं। इसने ब्रांड वैल्‍यू को और मजबूत किया। शंकर फार्म फ्रेश आज सिर्फ डेयरी क्षेत्र में नहीं है बल्कि सब्जियों की भी खेती कर रही है। तीन एकड़ खेत में 12 किसानों का समूह काम करता है। बढ़ते नुकसान के कारण जो कंपनी कभी बंद होने वाली थी, उसने पिछले साल  15 लाख रुपये का टर्नओवर हासिल किया है।

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