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1100 साल पुराने मंदिर का रहस्य, जहां मुसलमान नमाज और हिंदू करते हैं वाग्देवी की पूजा

  • Edited By Priya Yadav,
  • Updated: 21 Jan, 2026 03:23 PM
1100 साल पुराने मंदिर का रहस्य, जहां मुसलमान नमाज और हिंदू करते हैं वाग्देवी की पूजा

नारी डेस्क: Bhojshala Saraswati Puja: हर साल बसंत पंचमी पर मां सरस्वती की पूजा बड़े धूमधाम से होती है। इस बार मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित प्राचीन भोजशाला परिसर को लेकर विवाद फिर गरमा गया है। हिंदू पक्ष इसे वाग्देवी का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद कहता है।

बसंत पंचमी और विवाद

बसंत पंचमी हिंदू धर्म का प्रमुख त्योहार है, जिसे माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। यह दिन ज्ञान, कला, संगीत और बुद्धि की देवी मां सरस्वती के लिए विशेष महत्व रखता है। इस बार, बसंत पंचमी और जुमे की नमाज के दिन का टकराव होने के कारण मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया।

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हिंदू पक्ष ने कोर्ट से इस दिन पूजा करने की अनुमति मांगी और मुसलमानों को प्रवेश रोकने का अनुरोध किया। मुस्लिम पक्ष शुक्रवार को नमाज पढ़ता है। भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने हिंदू पक्ष को मंगलवार और बसंत पंचमी के दिन पूजा की अनुमति दी है। अभी दोनों पक्षों का भोजशाला परिसर पर कब्जा है और कोर्ट में मामले की सुनवाई चल रही है।

भोजशाला का इतिहास

भोजशाला का इतिहास 11वीं सदी का है। माना जाता है कि परमार वंश के महान शासक राजा भोज ने 1000–1055 ईस्वी में यहां ज्ञान और विद्या का केंद्र स्थापित किया। यह केंद्र भोजशाला के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यहां शास्त्र, भाषा, संस्कृति और संगीत जैसे विषय पढ़ाए जाते थे। राजा भोज के शासन काल में देवी सरस्वती की मूर्ति स्थापित की गई थी, जिसे वाग्देवी कहा गया। बाद में मुस्लिम शासकों ने इसे मस्जिद में बदल दिया, लेकिन मंदिर के अवशेष आज भी मौजूद हैं।

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वाग्देवी का स्वरूप

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, देवी सरस्वती को वाग्देवी और ब्रह्मस्वरूपा कहा गया है। उन्हें ज्ञान, कला और सृजन का प्रतीक माना जाता है। विष्णुधर्मोत्तर पुराण में उन्हें चार भुजाओं वाली और सुंदर आभूषणों से अलंकृत बताया गया है। स्कंद पुराण में उनका वर्णन कमल के आसन पर विराजमान और जटा-जूट धारण किए हुए किया गया है। वाग्देवी को कामधेनु के समान सर्वस्व प्रदान करने वाली देवी माना जाता है।

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सरस्वती पूजा का महत्व

मान्यता है कि माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को देवी सरस्वती का प्राकट्य हुआ था। इस दिन को वसंत पंचमी कहा जाता है। छात्र, विद्वान और कला-कौशल से जुड़े लोग इस दिन देवी सरस्वती की पूजा करते हैं। इस दिन ज्ञान, बुद्धि और कला में सफलता की कामना की जाती है। बसंत पंचमी पर विशेष रूप से पीले रंग के कपड़े पहनने और पंचामृत, फूल व सरसों के दानों से पूजा करने की परंपरा है।

धार के 1100 साल पुराने भोजशाला परिसर का इतिहास और महत्व बेहद गहरा है। यह स्थान ज्ञान और भक्ति का प्रतीक है, जहां आज भी हिन्दू और मुस्लिम समुदाय अपनी-अपनी परंपराओं के अनुसार पूजा और नमाज अदा करते हैं।   

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