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बच्चेदानी में गांठें होगी तो नहीं होगी प्रेगनेंसी, रसौली ठीक करने का देसी इलाज

  • Edited By Vandana,
  • Updated: 19 Feb, 2026 09:07 PM
बच्चेदानी में गांठें होगी तो नहीं होगी प्रेगनेंसी, रसौली ठीक करने का देसी इलाज

नारी डेस्कः कुछ समस्याएं सिर्फ महिलाओं को होती है, जैसे कि बच्चेदानी से जुड़ी समस्या। यूट्रस से जुड़ी दिक्कत में महिलाओं को आम होने वाली दिक्कत बच्चेदानी की गांठ भी रहती है। (Uterus) में गांठ, आम भाषा में इसे बच्चेदानी में गांठ, रसौली, सिस्ट भी कह देते हैं। इस बीमारी के दौरान महिला के बच्चेदानी में उसकी दीवार के अंदर बाहर दोनों तरफ कई प्रकार की गांठे आ जाती है हालांकि ज्यादातर गांठें, कैंसर की नहीं होती लेकिन कुछ मामलों में ये गांठें कैंसर की भी हो सकती है जो कि सिर्फ सर्जरी से ही हटाई जा सकती है और ऐसा बहुत ही कम मामले में पाया जाता है, अधिकतर समय गांठे सामान्य होती है जो की ख़राब दिन चर्या की वजह से पैदा होती है लेकिन क्या इन गांठों का इलाज घर पर संभव है चलिए इस बारे में ही जानते हैं। ऐसे बहुत से कारण हैं जैसे बढ़ती उम्र, प्रेग्नेंसी, मोटापा जिसकी वजह से बच्चेदानी में गांठ की समस्या हो जाती है। गांठों की वजह हमारी जीवनशैली से जुड़ी रहती है।

बच्चेदानी (गर्भाशय) में गांठ क्यों होती है? जानिए कारण, लक्षण और बचाव

बच्चेदानी में बनने वाली गांठों को चिकित्सकीय भाषा में यूटराइन फाइब्रॉइड (Uterine Fibroids) कहा जाता है। ये ज्यादातर गैर-कैंसरकारी (Benign) होती हैं, लेकिन आकार और संख्या के आधार पर परेशानी बढ़ा सकती हैं। हर महिला में इसके कारण अलग-अलग हो सकते हैं, इसलिए पूरी तरह सटीक कारण बताना मुश्किल है, फिर भी कुछ प्रमुख वजहें सामने आई हैं।

1. हार्मोन का असंतुलन: महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन गर्भाशय की परत को नियंत्रित करते हैं। जब एस्ट्रोजन का स्तर ज्यादा हो जाता है-जैसे गर्भावस्था, हार्मोनल दवाओं या पीसीओएस जैसी स्थितियों में तो फाइब्रॉइड बनने की संभावना बढ़ सकती है।

2. आनुवंशिक (Genetic) कारण: अगर परिवार में मां, बहन या दादी को फाइब्रॉइड की समस्या रही है, तो जोखिम थोड़ा बढ़ जाता है। कुछ जीन परिवर्तन (Gene Mutations) भी इसके विकास से जुड़े पाए गए हैं।

3. मोटापा और वजन बढ़ना: अधिक शरीर की चर्बी एस्ट्रोजन के स्तर को बढ़ा सकती है। इसलिए मोटापे से ग्रस्त महिलाओं में गर्भाशय में गांठ बनने की आशंका अधिक देखी गई है।

4. जीवनशैली और खानपान

विटामिन D की कमी
ज्यादा लाल मांस और प्रोसेस्ड फूड
कम फल-सब्जियां
शारीरिक गतिविधि की कमी
शराब या तंबाकू का सेवन
ये सभी कारक जोखिम को बढ़ा सकते हैं।

5. जल्दी मासिक धर्म की शुरुआत: 10 साल से पहले पीरियड्स शुरू होना भी एक संभावित जोखिम कारक माना जाता है।

बच्चेदानी में गांठ के लक्षण

हर महिला में लक्षण अलग हो सकते हैं, और कई बार कोई लक्षण नहीं भी होता। लेकिन सामान्य संकेत इस प्रकार हैं:
अत्यधिक या लंबा मासिक धर्म
पीरियड्स के दौरान बहुत अधिक दर्द
पेट या कमर में भारीपन या दबाव
बार-बार पेशाब आना
संभोग के दौरान दर्द
बांझपन या गर्भधारण में कठिनाई (कुछ मामलों में)
पेट का असामान्य रूप से बढ़ना
अगर ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।

बच्चेदानी में गांठ के बचाव के उपाय

पूरी तरह रोकथाम संभव नहीं है, लेकिन जोखिम कम किया जा सकता है:
संतुलित और पौष्टिक आहार लें (हरी सब्जियां, फल, साबुत अनाज)
नियमित व्यायाम करें
वजन नियंत्रित रखें
विटामिन D की जांच और जरूरत पड़ने पर सप्लीमेंट लें
शराब और धूम्रपान से बचें
नियमित स्त्री रोग विशेषज्ञ से चेक-अप कराएं
गलत खानपान और नशा से बचें क्योंकि ये गर्भाशय पर असर डालते है।
प्रोसेस्ड फूड, लाल मांस, और अत्यधिक वसा युक्त भोजन से बचें।

क्या घरेलू उपाय से ठीक हो सकती है बच्चेदानी की गांठ?

बच्चेदानी की गांठ अधिकतर मामलों में गैर-कैंसरकारी होती है। कई महिलाओं में ये छोटी होती हैं और कोई खास लक्षण नहीं देतीं। ऐसे मामलों में डॉक्टर अक्सर केवल नियमित जांच और निगरानी (Monitoring) की सलाह देते हैं। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि घरेलू उपाय फाइब्रॉइड को पूरी तरह खत्म नहीं करते, बल्कि वे केवल लक्षणों को कम करने और शरीर को संतुलित रखने में सहायक हो सकते हैं। बड़ी, तेजी से बढ़ने वाली या अत्यधिक दर्द व रक्तस्राव देने वाली गांठों का इलाज डॉक्टर की देखरेख में ही संभव है।

पोषणयुक्त आहार की भूमिका

संतुलित आहार हार्मोन संतुलन और वजन नियंत्रण में मदद करता है, जिससे फाइब्रॉइड के लक्षण कम हो सकते हैं।
हरी पत्तेदार सब्जियां (पालक, मेथी)
ताजे फल (अनार, सेब, अमरूद)
साबुत अनाज और दालें
डेयरी उत्पाद (यदि सहन हो)

विटामिन D और आयरन की पर्याप्त मात्रा

यदि भोजन से पोषण की पूर्ति नहीं हो पा रही हो, तो डॉक्टर की सलाह से सप्लीमेंट लिया जा सकता है। 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के लिए नियमित हेल्थ चेकअप और विटामिन स्तर की जांच करवाना विशेष रूप से जरूरी है।

आयुर्वेदिक उपाय – कितने कारगर?

कुछ आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां लक्षणों में राहत देने के लिए उपयोग की जाती हैं, लेकिन इन्हें भी विशेषज्ञ की सलाह से ही लेना चाहिए।

त्रिफलाः इसे पाचन सुधारने और शरीर से विषैले तत्व बाहर निकालने में सहायक माना जाता है। कुछ अध्ययनों में इसके एंटीऑक्सीडेंट गुणों का उल्लेख है, पर इसे फाइब्रॉइड का पूर्ण इलाज नहीं माना जा सकता।

आंवला और हल्दीः हल्दी में मौजूद करक्यूमिन सूजन कम करने में मदद कर सकता है। आंवला इम्यूनिटी बढ़ाने में सहायक है। ये शरीर की समग्र सेहत सुधारते हैं, जिससे लक्षणों में कुछ राहत मिल सकती है।

शतावरी और अशोकः आयुर्वेद में इन्हें महिलाओं के हार्मोन संतुलन के लिए उपयोग किया जाता है। मासिक धर्म की अनियमितता या दर्द में कुछ राहत मिल सकती है।

ध्यान दें: आयुर्वेदिक दवाएं भी बिना सलाह के न लें, क्योंकि हर शरीर की प्रकृति अलग होती है।

 शारीरिक फिटनेस का महत्व

नियमित व्यायाम और योग हार्मोन संतुलन व वजन नियंत्रण में सहायक हो सकते हैं।
रोज कम से कम 30 मिनट व्यायाम
योगासन जैसे पवनमुक्तासन, भुजंगासन और मलासन
प्राणायाम और ध्यान (Stress कम करने के लिए)
तनाव (Stress) भी हार्मोन असंतुलन को बढ़ा सकता है इसलिए मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना जरूरी है।

कब जरूरी है मेडिकल इलाज?

यदि लक्षण गंभीर हों तो घरेलू उपाय पर्याप्त नहीं होते।
हार्मोनल दवाएं
दर्द और रक्तस्राव नियंत्रित करने की दवाएं
मायोमेक्टॉमी (गांठ निकालना)
हिस्टेरेक्टॉमी (गर्भाशय निकालना – गंभीर मामलों में)

तुरंत डॉक्टर से संपर्क कब करें?

अत्यधिक या लंबे समय तक रक्तस्राव
तेज पेट या कमर दर्द
पेट का तेजी से बढ़ना
गर्भधारण में समस्या
प्रेग्नेंसी के दौरान जटिलताएं

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