नारी डेस्क: 20 मई 2012 का दिन था। माउंट एवरेस्ट की चोटी के पास मौसम बेहद खतरनाक था। तापमान –55 डिग्री सेल्सियस तक गिर चुका था। लगभग 200 पर्वतारोही तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहे थे, क्योंकि एक भी छोटी गलती जान ले सकती थी। बीते कुछ घंटों में दो लोगों की मौत हो चुकी थी और आगे भी खतरा बना हुआ था। इसी भीषण माहौल में एक युवा पर्वतारोही नादव बेन-येहुदा, जो इज़राइल के रेहोवोट शहर का 24 वर्षीय लॉ स्टूडेंट था, अपने सपने के बेहद करीब था। वह माउंट एवरेस्ट की चोटी से सिर्फ 300 मीटर दूर था। अगर वह आगे बढ़ता, तो एवरेस्ट फतह करने वाला सबसे कम उम्र का इज़रायली बन जाता।
एक पल जिसने सब बदल दिया
तभी नादव की नज़र अपने सामने पड़े एक व्यक्ति पर पड़ी। वह जीवित था, लेकिन बुरी हालत में था। यह व्यक्ति आयदिन इरमक, एक 46 वर्षीय तुर्की पर्वतारोही था, जिससे नादव की दोस्ती काठमांडू में हुई थी। आयदिन बेहोश पड़ा था। उसके पास न तो ऑक्सीजन मास्क था, न दस्ताने, न हार्नेस, न क्रैम्पोन और न ही आने वाले तूफान से बचने का कोई साधन। नादव ने बाद में बताया, “उसके पास कुछ भी नहीं था। वह बस मौत का इंतज़ार कर रहा था।” नादव ने उसे आवाज़ दी, “आयदिन, उठो!” लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। आसपास से गुजरते कई पर्वतारोहियों ने उसे देखा, लेकिन सब अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते चले गए।
शिखर छोड़ इंसानियत को चुना
नादव के सामने सबसे कठिन फैसला था। अगर वह आगे बढ़ता, तो आयदिन की मौत तय थी। नादव ने कहा, “मैं एक पल भी नहीं रुका। मुझे पता था कि मुझे उसे बचाना ही है।” उसी क्षण नादव ने अपने जीवन का सबसे बड़ा सपना छोड़ दिया। अब उसके लिए केवल एक चीज़ मायने रखती थी एक इंसान की जान बचाना।
अकेले लड़ा मौत से
कोई भी मदद के लिए आगे नहीं आया। अकेले नादव ने आयदिन को अपने हार्नेस से बांधा और नीचे उतरना शुरू किया। नीचे तक पहुँचने में करीब 8 घंटे लगने थे। 190 पाउंड वज़न वाले अचेत व्यक्ति को कंधों पर उठाकर, घसीटकर और कभी पैरों के बीच संभालकर वह खतरनाक ढलानों से नीचे उतरता रहा। कई बार दोनों फिसले और करीब 50 फीट नीचे गिर पड़े। कभी-कभी आयदिन को होश आता और वह दर्द से चीखने लगता, जिससे सफर और मुश्किल हो जाता।
खुद की जान भी खतरे में
इस दौरान नादव का ऑक्सीजन मास्क टूट गया और उसके दोनों ऑक्सीजन सिलेंडर खराब हो गए। ठंड इतनी ज़्यादा थी कि उसने अपने दाहिने हाथ के दस्ताने उतार दिए, जिससे उसे फ्रॉस्टबाइट हो गया। नादव ने कहा, “वही एक पल था जब मैं सच में घबरा गया था।”
आख़िरकार बची जान
जब वे कैंप के पास पहुँचे, दोनों की हालत बेहद खराब थी। कैंप से सिर्फ 100 गज पहले नादव गिर पड़ा। उसके हाथ, गाल और पैर बुरी तरह जम चुके थे। उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया और तेल अवीव के असाफ हारोफे अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने चेतावनी दी कि उसकी उंगलियां काटनी पड़ सकती हैं, लेकिन चमत्कारिक रूप से उन्हें बचा लिया गया। इस पूरी यात्रा में नादव का 20 किलो वजन कम हो गया था।
कोई पछतावा नहीं
इतनी पीड़ा और एवरेस्ट की चोटी तक न पहुँच पाने के बावजूद नादव को कोई अफसोस नहीं था। उसने कहा, “किसी भी इंसान की जान, किसी भी सपने से ज़्यादा कीमती होती है। अगर मेरी उंगलियां भी चली जातीं, तो भी मुझे कोई दुख नहीं होता।” पत्रकारों से बात करते हुए उसने कहा, “मैं कोई हीरो नहीं हूँ, लेकिन मैं इज़रायली हूँ। हमें सिखाया जाता है कि अपने साथी को कभी पीछे नहीं छोड़ा जाता। मैं शिखर तक नहीं पहुँचा, लेकिन मैंने किसी की जान बचाई।”
इंसानियत की सबसे ऊंची चोटी
आयदिन इरमक की जान बचाने के बाद नादव ने पर्वतीय बचाव कार्य को अपना जीवन बना लिया। एवरेस्ट पर उसका यह साहस यह साबित करता है कि मानव जीवन सबसे मूल्यवान है। तोराह में लिखा है-“जब तुम्हारे साथी का खून बह रहा हो, तब चुपचाप खड़े मत रहो।”