
नारी डेस्क : Supreme Court of India में केंद्र सरकार ने ट्रांसजेंडर्स, समलैंगिक पुरुषों (MSM) और महिला यौनकर्मी के रक्तदान पर लगी रोक को सही ठहराया है। सरकार ने कहा कि यह फैसला किसी भी तरह का भेदभाव नहीं है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और मरीजों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। केंद्र सरकार का कहना है कि कई स्वास्थ्य अध्ययनों में पाया गया है कि इन समूहों में HIV संक्रमण का खतरा आम लोगों की तुलना में 6 से 13 गुना अधिक हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने रखा पक्ष
इस मामले की सुनवाई Surya Kant की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ के सामने हुई। केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल Aishwarya Bhati ने अदालत में दलील पेश की। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय रक्त नीति का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि रक्तदान केवल सुरक्षित डोनर समूहों से ही लिया जाए, ताकि मरीजों को संक्रमण का खतरा न हो।

उच्च जोखिम वाले समूहों से रक्त लेना नीति के खिलाफ
Ministry of Health and Family Welfare (India) ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने हलफनामे में कहा कि ट्रांसजेंडर्स, समलैंगिक पुरुषों और महिला यौनकर्मी में एचआईवी के साथ-साथ हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी संक्रमण का जोखिम भी ज्यादा पाया गया है। सरकार के अनुसार, ऐसे उच्च जोखिम वाले समूहों से रक्त लेना राष्ट्रीय रक्त नीति के सिद्धांतों के खिलाफ है।
सरकारी रिपोर्ट में भी सामने आए आंकड़े
स्वास्थ्य मंत्रालय की 2020–21 की वार्षिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए सरकार ने बताया कि सामान्य वयस्क आबादी की तुलना में इन विशेष समूहों में एचआईवी संक्रमण का प्रसार 6 से 13 गुना अधिक है। केंद्र सरकार ने यह भी बताया कि इस तरह के प्रतिबंध केवल भारत में ही नहीं, बल्कि कई देशों में लागू हैं। उदाहरण के तौर पर कई यूरोपीय देशों में यौन रूप से सक्रिय समलैंगिक पुरुषों (MSM) को रक्तदान करने से स्थायी रूप से रोका गया है, ताकि रक्त के जरिए फैलने वाले संक्रमणों का खतरा कम किया जा सके।

सार्वजनिक स्वास्थ्य को बताया सबसे महत्वपूर्ण
सरकार ने अदालत में कहा कि गंभीर रूप से बीमार मरीजों की जान बचाने के लिए रक्त चढ़ाना अक्सर अंतिम विकल्प होता है। ऐसे में यह जरूरी है कि रक्त के माध्यम से किसी भी प्रकार के संक्रमण का जोखिम पूरी तरह खत्म किया जाए। सरकार के मुताबिक इस मुद्दे को केवल व्यक्तिगत अधिकारों के नजरिए से नहीं देखा जा सकता, बल्कि इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य और मरीजों की सुरक्षा के व्यापक दृष्टिकोण से समझना जरूरी है।