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गोपेश्वर रूप में क्यों पूजे जाते हैं शिव? जानिए कृष्ण और शरद पूर्णिमा से गहरा संबंध

  • Edited By Monika,
  • Updated: 06 Oct, 2025 05:50 PM
गोपेश्वर रूप में क्यों पूजे जाते हैं शिव? जानिए कृष्ण और शरद पूर्णिमा से गहरा संबंध

नारी डेस्क : भगवान शिव के अनेक दिव्य रूपों में से एक है ‘गोपेश्वर महादेव’, जिसका संबंध सीधे भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला से जुड़ा हुआ है। इस रूप का उल्लेख भागवत पुराण और अन्य अनेक ग्रंथों में मिलता है। यह रूप न केवल भक्ति का प्रतीक है बल्कि शिव और कृष्ण के प्रेम, भक्ति तथा एकत्व का दिव्य उदाहरण भी है।

गोपेश्वर महादेव मंदिर का महत्व

मथुरा के वृंदावन में स्थित बनखंडी का गोपेश्वर महादेव मंदिर अत्यंत प्रसिद्ध है। मान्यता है कि इस मंदिर में सुबह भगवान शिव नर रूप में और शाम को नारी रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। भक्तों के अनुसार, यह रूप भगवान शिव को श्रीकृष्ण की कृपा से प्राप्त हुआ था।

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जब भगवान शिव बने गोपी

कहा जाता है कि द्वापर युग में जब भगवान श्रीकृष्ण शरद पूर्णिमा की रात को गोपियों के साथ महारास कर रहे थे, तब यह दृश्य देखने सभी देवता आए। हर देवता इस अनोखी रासलीला में शामिल होना चाहता था। भगवान शिव ने भी इच्छा जताई कि वे इस ‘महारास’ में शामिल होकर श्रीकृष्ण के आनंदमय स्वरूप का अनुभव करें। लेकिन गोपियों ने शिव को प्रवेश की अनुमति नहीं दी क्योंकि वहां केवल गोपियों को ही प्रवेश था, कोई भी पुरुष अंदर नहीं जा सकता था।

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जब शिव ने धारण किया गोपी का रूप

तब भगवान शिव ने अपनी योगमाया शक्ति का सहारा लिया और गोपियों का रूप धारण कर लिया। गोपी बनकर उन्होंने रासलीला में प्रवेश किया और श्रीकृष्ण संग ताल से ताल मिलाई। श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य दृष्टि से पहचान लिया कि यह कोई साधारण गोपी नहीं, बल्कि उनके आराध्य भगवान शिव हैं।

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तब श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा — “आओ गोपेश्वर!”

और इस प्रकार शिव को ‘गोपेश्वर’ नाम मिला। श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि वे इसी रूप में ब्रजधाम में विराजमान रहें और सभी भक्तों के लिए रासलीला के साक्षी बने रहें।

शरद पूर्णिमा से जुड़ा रहस्य

शास्त्रों के अनुसार, यह रासलीला शरद पूर्णिमा की रात्रि को आरंभ हुई थी। उस रात श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया से छह महीने तक रात्रि को ही स्थिर कर दिया था ताकि महारास निरंतर चलता रहे। इसी कारण शरद पूर्णिमा को आज भी ‘रास पूर्णिमा’ कहा जाता है, और ब्रजभूमि में यह पर्व अत्यंत श्रद्धा और भक्ति से मनाया जाता है। कहा जाता है कि आज भी निधिवन में रात्रि के समय भगवान श्रीकृष्ण गोपियों संग रास करते हैं, और इसलिए सूर्यास्त के बाद वहां किसी को प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाती।

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गोपेश्वर रूप की पूजा

मथुरा के गोपेश्वर महादेव मंदिर में आज भी भगवान शिव का विशेष श्रृंगार किया जाता है।

प्रातःकाल: शिव को उनके नर रूप में पूजा जाता है।

सायंकाल: उन्हें नारी स्वरूप (गोपेश्वर रूप) में सजाया जाता है।

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इस रूप की पूजा शिव और श्रीकृष्ण के मिलन, भक्ति और सौंदर्य के प्रतीक के रूप में की जाती है। भक्त मानते हैं कि जो व्यक्ति गोपेश्वर महादेव का दर्शन कर रासलीला के भावों को स्मरण करता है, उसके जीवन में प्रेम, शांति और भक्ति की वृद्धि होती है।

गोपेश्वर रूप में भगवान शिव, भक्ति और प्रेम के सर्वोच्च प्रतीक हैं। उन्होंने यह दिखाया कि ईश्वर के प्रति समर्पण में रूप या लिंग का कोई बंधन नहीं, केवल भक्ति और प्रेम ही सर्वोपरि है। शरद पूर्णिमा की रात जब चांद पूर्ण तेज से चमकता है, तब भक्त मानते हैं कि उसी दिव्य प्रकाश में आज भी ब्रजभूमि में गोपेश्वर महादेव और श्रीकृष्ण की रासलीला का अदृश्य संगम होता है।

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