
कहते हैं कि भगवान हर जगह नहीं पहुंच सकते इसलिए तो उन्होंने मां को बनाया है। मां की ममता सिर्फ इंसानों में ही नहीं बल्कि पशु-पक्षियों व अन्य जन्तुओं में भी वैसे ही होती है। मां का दिल इतना कोमल होता है कि वह बच्चे के लिए हर दर्द सहने को तैयार हो जाती है लेकिन असल ममता वो है जो दूसरे के बच्चे को देखकर भी वैसे ही बरसाई जाए और यह उदाहरण बिलकुल फिट बैठती है, राजस्थान की रहने वाली बिश्नोई समाज की औरतों पर ...
इस बात का उदाहरण है राजस्थान की रहने वाली बिश्नोई समाज की महिलाएं, जो ना सिर्फ अपने बच्चों को बल्कि हिरण के बच्चों को भी अपना दूध पिलाती हैं। राजस्थान के बिश्नोई समाज की औरतें सिर्फ अपने ही नहीं बल्कि हिरण के बच्चों को भी अपना दूध पिलाती हैं और उन्हें बच्चे की तरह पालती हैं। ऐसा यह औरतें लगभग 500 सालों से कर रही हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी यह महिलाएं अपना दूध पिलाती आ रही हैं। इस समाज की औरतें खुद को हिरण की मां ही कहती हैं।

इस समाज की महिला पीढ़ियां लगभग 500 सालों से हिरण के बच्चों को अपना दूध पिलाती आ रही हैं। इस समाज की महिलाएं खुद को हिरण के इन बच्चों की मां कहती हैं। यही नहीं, महिलाओं के साथ इस समाज के पुरुष अनाथ हो चुके हिरण के बच्चों को अपने घरों में परिवार की तरह से पालते हैं।
विष्णु भगवान से मिला यह नाम
बता दें कि पर्यावरण की पूजा करने वाले बिश्नोई समाज को ये नाम भगवान विष्णु से मिला। यह लोग ज्यादातर जंगल और थार के रेगिस्तान के पास रहते हैं। यह लोग कई नियमों का पालन कड़ाई से किया करते है।

पेड़ बचाने के लिए 363 बिश्नोई लोगों ने दिया था बलिदान
इस समाज से जुड़ी एक बलिदान की कहानी भी है। पेड़ों को बचाने के लिए यहां लोग पेड़ों से चिपक गए थे और उन्होंने पेड़ों की रक्षा अपनी आहुति देकर की थी। दरअसल, सन 1730 में खेजड़ली में पेड़ों की रक्षा के लिए विश्नोई समाज ने जो बलिदान दिया है वो मानव इतिहास में अद्वितीय है।

कहा जाता है कि जोधपुर के राजा अभयसिंह को युद्ध से थोड़ा समय मिला था तो उन्होंने महल बनवाने की सोची थी जिसके लिए चूने की भट्टी जलाने केलिए उन्हें लकड़ी की जरूरत थी और राजा ने मंत्री गिरधारी दास भण्डारी को लकड़ी इक्टठा करने का काम सौंपा गया। इसी के चलते उनकी नजर पड़ी गांव खेजडली के पेडों पर लेकिन वहां के लोगों ने इसका विरोध किया जिसके चलते 363 लोगों की हत्या कर दी गई थी जिसमें सबसे पहला नाम अमृता देवी का आता है, जब वह पेड़ काटने आए तो वह पेड़ पर लिपट गई लेकिन उनकी निर्मम हत्या कर दी गई। जब बात राजा तक पहुंची तो उन्होंने क्षमा याचना की और शहीद लोगों के बलिदान पर शोक व्यक्त किया और उसके बाद में राजा ने पेड़ की कटाई के काम पर रोक बना दी लगा दी और कानून बना दिया। आज वहां शहीद और बलिदानयों के लिए स्मारक बना हुआ है और अमृता देवी के नाम पर वाटिका बनी हुई है।