05 APRSUNDAY2026 5:26:54 PM
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वोट देने में आगे, लेकिन चुनाव लड़ने में पीछे क्यों हैं महिलाएं?

  • Edited By Priya Yadav,
  • Updated: 05 Apr, 2026 10:34 AM
वोट देने में आगे, लेकिन चुनाव लड़ने में पीछे क्यों हैं महिलाएं?

नारी डेस्क: भारत में महिलाएं मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं और कई बार पुरुषों से आगे भी रहती हैं। लेकिन जब चुनाव लड़ने की बात आती है, तो उनकी भागीदारी काफी कम नजर आती है। यह अंतर बताता है कि राजनीतिक व्यवस्था में महिलाओं को अभी भी बराबर मौके नहीं मिल पा रहे हैं।  ऐसे में यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या सिर्फ वोट देने तक ही महिलाओं की भूमिका सीमित रह जाएगी, या फिर उन्हें राजनीति में बराबरी का मौका भी मिलेगा? लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए जरूरी है कि महिलाएं सिर्फ मतदाता ही नहीं, बल्कि निर्णय लेने वाली भी बनें।

आरक्षण कानून के बावजूद नहीं दिख रहा असर

केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ने हाल ही में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का कानून पास किया है। हालांकि, यह कानून अभी लागू नहीं हुआ है। इस कानून से उम्मीद थी कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ेगी, लेकिन असम के मौजूदा चुनावी आंकड़े कुछ और ही कहानी बता रहे हैं। यहां महिला उम्मीदवारों की संख्या में अपेक्षित बढ़ोतरी देखने को नहीं मिल रही।

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महिला उम्मीदवारों की संख्या में लगातार गिरावट

असम विधानसभा चुनावों के पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो महिलाओं की भागीदारी में गिरावट साफ दिखाई देती है। वर्ष 2016 में 91 महिला उम्मीदवार चुनाव मैदान में थीं। वर्ष 2021 में यह संख्या घटकर 76 रह गई और 2026 के चुनाव में केवल 59 महिलाएं ही चुनाव लड़ रही हैं। यानी 2016 से 2026 के बीच महिला उम्मीदवारों की संख्या में लगातार कमी आई है। यह गिरावट इस बात का संकेत है कि राजनीतिक दल महिलाओं को टिकट देने में पीछे हट रहे हैं।

प्रतिशत के आंकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं

अगर कुल उम्मीदवारों में महिलाओं की हिस्सेदारी देखें तो स्थिति और स्पष्ट हो जाती है। 2011 में महिलाओं की हिस्सेदारी 8.66% थी। 2016 में यह घटकर 8.55% हो गई। 2021 में यह और गिरकर 8.03% रह गई। 2026 में यह थोड़ा बढ़कर 8.17% जरूर हुई है। लेकिन यह बढ़ोतरी केवल आंकड़ों का भ्रम है, क्योंकि कुल उम्मीदवारों की संख्या ही कम हो गई है। इसलिए वास्तविक भागीदारी में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ है।

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राजनीतिक दलों की रणनीति पर सवाल

राजनीतिक दलों की रणनीति भी इस मुद्दे पर सवाल खड़े करती है।भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस बार 14 महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया है और खुद को अधिक समावेशी बताया है। वहीं, भारतीय जनता पार्टी ने 2021 की तरह इस बार भी केवल 7 महिलाओं को टिकट दिया है। भाजपा का कहना है कि पार्टी ऐसे उम्मीदवारों को प्राथमिकता देती है जिनकी जीत की संभावना अधिक हो। लेकिन इस तर्क पर कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या महिलाओं को पर्याप्त अवसर दिए जा रहे हैं?

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महिलाओं के मतदान और उम्मीदवारी में अंतर

एक दिलचस्प और चिंताजनक तथ्य यह है कि मतदान के समय महिलाओं की भागीदारी अक्सर पुरुषों से अधिक होती है। इसके बावजूद, जब चुनाव लड़ने की बात आती है तो महिलाओं की संख्या काफी कम रहती है। इससे यह साफ होता है कि महिलाएं वोट देने में तो आगे हैं, लेकिन उन्हें उम्मीदवार बनने का मौका कम मिल रहा है।

सामाजिक संगठनों की चिंता

महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने इस गिरावट पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि यह स्थिति बताती है कि महिलाओं को केवल सीमित अवसर देकर राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक महिलाओं को पर्याप्त टिकट और समर्थन नहीं मिलेगा, तब तक उनकी राजनीतिक भागीदारी में वास्तविक सुधार नहीं हो सकता।

कुल उम्मीदवारों की संख्या भी हुई कम

2026 के असम विधानसभा चुनाव में कुल 722 उम्मीदवार मैदान में हैं, जो 1983 के बाद सबसे कम संख्या है।

इतिहास पर नजर डालें तो

1983 में 471 उम्मीदवार थे (असम आंदोलन के दौरान) 1991 में सबसे अधिक 1,657 उम्मीदवार मैदान में थे इससे यह भी पता चलता है कि चुनावी प्रतिस्पर्धा और भागीदारी का स्वरूप समय के साथ बदलता रहा है।

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निष्कर्ष: बदलाव की जरूरत

असम के चुनावी आंकड़े यह साफ दिखाते हैं कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के लिए अभी बहुत काम किया जाना बाकी है। सिर्फ कानून बनाने से बदलाव नहीं आएगा, बल्कि उसे लागू करना और राजनीतिक दलों की सोच में बदलाव लाना भी जरूरी है। जब तक महिलाओं को बराबर अवसर नहीं मिलेंगे, तब तक लोकतंत्र में उनकी वास्तविक भागीदारी अधूरी ही रहेगी।
 

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