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IVF बढ़ा देता है मां बनने की 70% संभावना, डिटेल में जानिए पूरा ट्रीटमेंट

  • Edited By Anjali Rajput,
  • Updated: 06 Aug, 2019 03:02 PM
IVF बढ़ा देता है मां बनने की 70% संभावना, डिटेल में जानिए पूरा ट्रीटमेंट

बच्चे भगवान का दिया सबसे खूबसूरत तोहफा है लेकिन किसी ना किसी कारण वश महिलाएं इस सुख से वंचित रह जाती हैं। इसके कारण कई बार महिलाओं को सामाजिक बहिष्‍कार का भी शिकार होना पड़ता है। मगर अब महिलाएं इस सुख से वंचित नहीं रहेंगी क्योंकि साइंस ने इतनी तरक्की कर ली है, जिससे हर महिला मां बन सकती हैं, इन्हीं तकनीक में से एक हैं IVF यानि टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक।

 

सिर्फ आम महिलाएं ही नहीं बल्कि फेमस एक्ट्रेस भी इस तकनीक के जरिए मां बन रही हैं। बता दें कि भारत में पहले टेस्ट ट्यूब बच्चे का जन्म 1986 में 6 अगस्त के दिन ही हुआ था। चलिए आज हम आपको बताते हैं कि महिलाओं के लिए कैसे मददगार है टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक।

क्या हैं आईवीएफ?

आईवीएफ यानि टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक ऐसी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन है, जिसमें महिलाओं के गर्भाश्य में दवाइयों व इंजैक्शन द्वारा सामान्य से ज्यादा अंधिक अंडे बनाए जाते हैं। इसके बाद सर्जरी के माध्यम से अंडो को निकाल कर प्रयोगशाला में कल्चर डिश में तैयार पति के शुक्राणुओं के साथ मिलाकर निषेचन (Fertilization) के लिए लैब में इसे दो या तीन दिन रखा जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में अल्ट्रासाउंड का इस्तेमाल किया जाता है। फिर जांच के बाद इससे बने भ्रूण को वापिस महिला के गर्भ में इम्प्लांट किया जाता है। IVF की प्रक्रिया में 2-3 हफ्ते का समय लग जाता है। बच्चेदानी में भ्रूण इम्प्लांट करने के बाद 14 दिनों में ब्लड या प्रेगनेंसी टेस्ट के जरिए इसकी सफलता और असफलता का पता चलता है। इससे महिला के मां बनने के संभावना करीब 70% तक होती है।

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आईवीएफ और सरोगेसी के क्या है फर्क?

आईवीएफ में अंडे को महिला से इकट्ठा किया जाता है और भ्रूण पैदा होने से पहले शुक्राणु को उसके पति से लिया जाता है और मां के गर्भाशय में डाला जाता है। जबकि सेरोगेसी का मतलब है 'किराए की कोख'। इसमें किसी दूसरी स्त्री की कोख में अपना बच्चा पालना होता है, जिसे 'सरोगेट मदर' भी कहते हैं। इसमें शुक्राणु पिता से आ सकता है वहीं अंडा किसी और द्वारा भी दान किया जा सकता है।

आईवीएफ के बारे में लोगों की धारणाएं

कुछ लोग समझते हैं कि आईवीएफ प्रक्रिया में बच्चा आपका नहीं होता लेकिन यह बहुत गलत धारणाएं हैं। इसमें अंडा पत्नी और शुक्राणु पति के ही होते हैं। इस ट्रीटमेंट से पैदा होने वाला बच्चा पति-पत्नी का ही होता है।

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क्या IVF से पैदा बच्चे सामान्य बच्चों से अलग होते हैं?

कुछ लोगों को लगता है कि इस तकनीक द्वारा पैदा हुए बच्चे दूसरों के मुकाबले असामान्य होते हैं जबकि यह धारणा बिल्कुल गलत है। बच्चे का स्वस्थ होना मां की सेहत पर निर्भर करता है। इन दोनों ही तरह के बच्चों में अंतर सिर्फ गर्भधारण करने के तरीके का होता है। IVF से जन्म लेने वाले बच्चे सामान्य बच्चों जितने ही हेल्दी होते हैं।

क्या उम्रदराज महिलाओं के लिए फायदेमंद है IVF?

40 से 44 उम्र की महिलाओं की गर्भधारण की क्षमता काफी कम होकर 10% से भी कम रह जाती है। इस उम्र तक महिला के माहवारी अनियमित या बंद हो जाती है, जिसके बाद प्रेगनेंसी मुश्किल होती है। अधिक उम्र में गर्भधारण हो भी जाए तो गर्भपात या फिर भ्रूण में विकार का खतरा रहता है। मगर अधिक उम्र में भी सुरक्षित तरीके से संतान की इच्छा को पूरा करने के लिए IVF बेहतरीन जरिया है।

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IVF के बाद कुछ सावधानियां बरतना जरूरी

आईवीएक तकनीक के जरिए निसंतान दंपतियों को मां-बाप बनने का सुख मिलता है लेकिन इस प्रक्रिया के बाद कई तरह की सावधानियां बरतनी बेहद जरूरी है ताकि प्रक्रिया में किसी तरह की कोई परेशानी न आए। 

संबंध बनाने से बचें

इस तकनीक से प्रेगनेंट होने के बाद संबंध बनाने से बचें क्योंकि इससे प्राइवेट पार्ट का खतरा रहता है, जिसके कारण यह प्रक्रिया असफल भी हो सकती है।

ना उठाएं वजन

इस दौरान किसी भी तरह का भारी सामान उठाएं। इससे पेट की मांसपेशियों पर दवाब पड़ने लगता है, जिससे प्रेगनेंसी पर असर पड़ सकता है।

ना करें बाथ टब का इस्तेमाल

IVF ट्रीटमेंट के बाद कम से कम 2 हफ्ते तक बाथ टब में ना नहाएं। इससे अंडा अपनी जगह से हट सकता है। इस ट्रीटमेंट में शॉवर बाथ लेना ही फायदेमंद है।

हैवी व्यायाम करने से बचें

प्रेगनेंसी में एक्सरसाइज करना अच्छा होता है लेकिन आईवीएफ के मामले में हल्दी-फुल्की एक्सरसाइज करने की ही सलाह दी जाती है। ऐसे में आप मॉर्निंग वॉक, प्रणायाम या मेडिटेशन कर सकती हैं।

नशीलें पदार्थों से दूरी

कैफीन, अल्कोहल, ड्रग्स, स्मोकिंग जैसी नशीली वस्तुओं का सेवन भी ना करें। इससे गर्भ ठहरने में परेशानी हो सकती है। 

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