
नारी डेस्क: दिल्ली में बच्चों का नर्सरी में एडमिशन अब सिर्फ स्कूल चुनने का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह मिडिल-क्लास पैरेंट्स के लिए मानसिक और आर्थिक तनाव का कारण बनता जा रहा है। जब कुछ टॉप प्राइवेट स्कूलों की फीस 6 लाख रुपये तक पहुंच गई है, तो माता-पिता की नींद उड़ना लाजमी है। दिल्ली में नर्सरी एडमिशन अब एक सोशल और फाइनेंशियल दबाव बन चुका है, खासकर मिडिल-क्लास परिवारों के लिए।
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आसमान छूती स्कूल फीस
दिल्ली के कई नामी प्राइवेट स्कूलों में नर्सरी की सालाना फीस 3 से 6 लाख रुपये है। इतने में तो एमबीए की पढ़ाई हो जाती है। इसके अलावा एडमिशन फीस, एनुअल चार्ज, एक्टिविटी फीस, ट्रांसपोर्ट फीस। कुल खर्च आम मिडिल-क्लास परिवार की सालाना कमाई के बराबर हो जाता है। आजकल कई पैरेंट्स पर यह दबाव होता है कि बच्चा “टॉप स्कूल” में ही पढ़े कम फीस वाले स्कूल को लोग कमतर न समझें। इस सोच ने पैरेंट्स की चिंता और अपराधबोध दोनों बढ़ा दिए हैं।
नर्सरी एडमिशन की रेस
सीमित सीटें, हजारों आवेदन ड्रॉ सिस्टम और इंटरव्यू का डर माता-पिता की चिंताओं को और बढ़ा रहा है। मिडिल-क्लास पर डबल प्रेशर है न वह बहुत अमीर ना वह सरकारी स्कूल में अपने बच्चे को भेजना चाहते हैं। पहले से ही उन पर EMI, घर का किराया, हेल्थ खर्च का बोझ है अब स्कूल फीस के लिए कर्ज या सेविंग तोड़नी पड़ रही है। यही वजह है कि पैरेंट्स “स्लीपलेस नाइट्स” से गुजर रहे हैं।
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क्या महंगी फीस = बेहतर शिक्षा?
एक्सपर्ट्स मानते हैं शुरुआती शिक्षा में प्यार, सुरक्षा और बेसिक्स ज़्यादा जरूरी हैं। महंगी इमारतें और टैबलेट क्लासरूम ही क्वालिटी एजुकेशन की गारंटी नहीं देते। बच्चे का असली विकास घर का माहौल, टीचर की संवेदनशीलता, पैरेंट्स का समय होता है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिर्फ ब्रांड नेम पर न जाएं स्कूल की टीचिंग क्वालिटी और वैल्यू सिस्टम देखें। बजट के अंदर रहकर फैसला लें। खुद को दूसरे पैरेंट्स से तुलना करने से बचें। ध्यान रखं बच्चे का भविष्य स्कूल की फीस से नहीं, परवरिश से बनता है।