15 JANTHURSDAY2026 5:37:19 PM
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दरभंगा रियासत की आखिरी महारानी का निधन, 94 वर्ष की उम्र में ली अंतिम सांस

  • Edited By Priya Yadav,
  • Updated: 15 Jan, 2026 03:47 PM
दरभंगा रियासत की आखिरी महारानी का निधन, 94 वर्ष की उम्र में ली अंतिम सांस

नारी डेस्क:  मिथिला के गौरवशाली इतिहास की साक्षी और दरभंगा रियासत की अंतिम महारानी महारानी कामसुंदरी देवी का सोमवार तड़के स्थानीय कल्याणी निवास में निधन हो गया। वह 94 वर्ष की थीं और पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ चल रही थीं। उनके निधन के साथ ही दरभंगा राज से जुड़ा इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय हमेशा के लिए समाप्त हो गया।

8 साल की उम्र में हुआ था विवाह

महारानी कामसुंदरी देवी का जन्म 22 अक्टूबर 1932 को मधुबनी जिले के मंगरौनी गांव में हुआ था। बेहद कम उम्र, मात्र 8 वर्ष की आयु में उनका विवाह दरभंगा राज के अंतिम महाराजा महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह से हुआ था। वह महाराजा की तीसरी पत्नी थीं। वर्ष 1962 में महाराजा कामेश्वर सिंह के निधन के बाद महारानी ने करीब 64 वर्षों तक वैधव्य जीवन व्यतीत किया।

सादगी और सेवा का जीवन

राजसी परिवार से होने के बावजूद महारानी कामसुंदरी देवी सादगीपूर्ण जीवन के लिए जानी जाती थीं। उन्होंने कभी राजसी ठाठ-बाट और वैभव को अपने जीवन का हिस्सा नहीं बनाया। निसंतान होने के बावजूद उन्होंने पूरे समाज को ही अपना परिवार माना। शिक्षा, धर्म, सेवा और सामाजिक कार्यों के प्रति उनका गहरा जुड़ाव था। उन्होंने मराठी मूल की शिक्षिका गंगाबाई से अंग्रेजी सहित कई विषयों की शिक्षा प्राप्त की थी।

मानवीय मूल्यों की मिसाल

महारानी जीवन भर राजपरंपराओं और मर्यादाओं का पालन करती रहीं। वैभव और संपन्नता के बीच रहते हुए भी उनका स्वभाव बेहद सरल, संयमी और संवेदनशील रहा। उनका जीवन त्याग, अनुशासन, मौन साधना और मानवीय मूल्यों को समर्पित रहा। वे दया, करुणा, प्रेम और सद्भावना की सजीव प्रतिमूर्ति मानी जाती थीं।

दरभंगा राज का गौरवशाली इतिहास

इतिहासकार डॉ. शंकर देव झा के अनुसार, दरभंगा राज बिहार के मिथिला क्षेत्र का एक शक्तिशाली और समृद्ध रजवाड़ा रहा है। इसकी स्थापना 16वीं सदी में महेश ठाकुर ने की थी। वर्ष 1577 में मुगल सम्राट अकबर ने महेश ठाकुर को तिरहुत का गवर्नर नियुक्त किया, जिसके बाद खंडवला ब्राह्मण परिवार का प्रभाव बढ़ा। 18वीं शताब्दी में माधव सिंह ने दरभंगा को राजधानी बनाया।

ब्रिटिश काल में दरभंगा राज भारत के सबसे बड़े जमींदारों में से एक था। यह करीब 24 हजार वर्ग मील क्षेत्र में फैला हुआ था और इसमें 110 से अधिक परगने शामिल थे। इस राजवंश की संपत्तियां देश-विदेश तक फैली थीं। निजी हवाई जहाज, निजी ट्रेन और भव्य महल इसकी समृद्धि के प्रतीक थे।

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खंडवला राजवंश का शासनकाल

खंडवला राजवंश का शासन महेश ठाकुर से शुरू होकर महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह तक चला। वर्ष 1962 में महाराजा कामेश्वर सिंह के निधन के साथ ही दरभंगा राज की राजशाही परंपरा समाप्त मानी जाती है। महारानी कामसुंदरी देवी इस राजवंश की अंतिम महारानी थीं।

उद्योग, रेल और विमान सेवा में योगदान

औद्योगिक क्षेत्र में भी दरभंगा राज का योगदान अहम रहा। सकरी, लोहट, रैयाम और हसनपुर की चीनी मिलें, पंडौल की सूत मिल, हायाघाट की अशोक पेपर मिल और समस्तीपुर की रमेश्वर जूट मिल इसी परिवार की देन हैं। भारत में विमान सेवा की शुरुआत भी दरभंगा राज से ही मानी जाती है। वर्ष 1962 के चीन युद्ध के दौरान इस परिवार ने भारत सरकार को 600 किलो सोना दान किया और अपना हवाई अड्डा भी सरकार को सौंप दिया।

पत्रकारिता, कला और संस्कृति में योगदान

पत्रकारिता के क्षेत्र में भी दरभंगा राज का योगदान उल्लेखनीय रहा। वर्ष 1909 में दरभंगा से मैथिली साप्ताहिक पत्रिका मिथिला मिहिर का प्रकाशन शुरू किया गया। इसके बाद पटना में इंडियन नेशन प्रेस की स्थापना हुई, जहां से अंग्रेजी अखबार इंडियन नेशन और हिंदी अखबार आर्यावर्त प्रकाशित हुए। कला और संगीत के क्षेत्र में ध्रुपद गायकी के लिए प्रसिद्ध अमृत घराना को दरभंगा में स्थापित किया गया। पंडित रामचतुर मल्लिक और विदुर मल्लिक जैसे महान कलाकार इसी घराने से जुड़े रहे।

आज भी जीवित हैं दरभंगा राज की निशानियां आज भी राम बाग पैलेस, आनंद बाग पैलेस, नरगौना पैलेस, बेला पैलेस, राज किला, राजनगर के महल और मंदिर दरभंगा राज की भव्यता की कहानी कहते हैं। बनारस का प्रसिद्ध दरभंगा घाट भी इस राजवंश की शक्ति और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।  

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