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नई फसल से ही नहीं, लोहड़ी का भगवान कृष्ण और माता सती से भी है नाता

  • Edited By vasudha,
  • Updated: 10 Jan, 2026 07:11 PM
नई फसल से ही नहीं, लोहड़ी का भगवान कृष्ण और माता सती से भी है नाता

नारी डेस्क: हर वर्ष जनवरी माह में मकर संक्रांति से पूर्व लोहड़ी का उत्सव मनाया जाता है। लोहड़ी के दिन भगवान सूर्यदेव व अग्नि की पूजा करने का विधान है। लोहड़ी पर्व का संबंध माता सती और भगवान श्रीकृष्ण से भी जुड़ा हुआ जाता है, जिसे धार्मिक और पौराणिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। इसके पीछे प्रचलित मान्यताएं इस प्रकार हैं

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माता सती की कथा

यह कथा तब की है जब माता सती ने अपने पिता राजा दक्ष के यज्ञ में भाग लिया था। राजा दक्ष ने अपने इस यज्ञ में भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया था, जिससे माता सती अपमानित महसूस कर रही थीं। यज्ञ के दौरान, राजा दक्ष ने भगवान शिव का अपमान किया, जिससे क्रोधित होकर माता सती ने ने अग्नि में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए। माना जाता है कि सती के अग्नि में समर्पित होने के कारण लोहड़ी का पर्व मनाया जाने लगा और तब से यह परंपरा चली आ रही है। 


भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी कथा


एक पौराणिक कथा के अनुसार, द्वापरयुग में एक समय मकर संक्रांति का पर्व मनाया गया। सभी लोग उसमें व्यस्त थे तब बालकृष्ण को मारने के लिए कंस ने एक राक्षसी को भेजा, जिसका नाम लोहिता था, लेकिन श्रीकृष्ण ने खेल ही खेल में लोहिता राक्षसी का वध कर दिया। मान्यता है कि लोहिता के वध के उपलक्ष्य में लोहड़ी का पर्व मनाया जाता है। इसके अलावा, मकर संक्रांति के आसपास मनाया जाने वाला यह पर्व गवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन परंपरा और ग्वाल-बाल संस्कृति** से भी जोड़ा जाता है।

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लोहड़ी में अग्नि का महत्व

अग्नि को देवता माना गया है। इस दिन में अग्नि में तिल, गुड़, मूंगफली अर्पित करना शुभ होता है। इस दिन नकारात्मक ऊर्जा के नाश और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। लोहड़ी केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि फसल और प्रकृति से जुड़ा पर्व भी है। यह नई फसल के स्वागत और सूर्य के उत्तरायण होने की खुशी में मनाया जाता है। यही कारण है कि यह पर्व आस्था, ऊर्जा और उल्लास का प्रतीक माना जाता है।
 

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