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Navratri: नवदुर्गा के पंचम रूप देवी स्कंदमाता की जानिए जन्मकथा और पूजन विधि

  • Edited By Anjali Rajput,
  • Updated: 16 Apr, 2021 04:49 PM
Navratri: नवदुर्गा के पंचम रूप देवी स्कंदमाता की जानिए जन्मकथा और पूजन विधि

नवरात्रि के पांचवे दिन नवदुर्गा मां के पांचवे स्वरूप माता स्कंदमाता का पूजन किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार, अगर मूढ़ व्यक्ति पर भी स्कंदमाता की दृष्टि पड़ जाए तो वह भी ज्ञानी हो जाता है। सिंह पर सवार माता की गोद में भगवान स्कंद कुमार (कार्तिकेय) बालरूप में बैठे होते हैं। माता को अपने पुत्र से बेहद प्रेम हैं इसलिए उन्हें उनके पुत्र के नाम के से पुकारा जाता है। माता की पूजा और उपवास करने से व्यक्ति का मन शुद्ध हो जाती है।

देवी स्कंदमाता की जन्मकथा

देवी स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं, दाहिनी भुजा में भगवान स्कंद, दाहिनी भुजा में कमल पकड़ा हुआ होता है। बाईं तरफ ऊपर वाली भुजा में वरदमुद्रा और नीचे वाली भुजा में कमल पुष्प है। माता का वर्ण एकदम शुभ्र और कमल के आसन पर विराजमान होने की वजह से उन्हें पद्मासना या विद्यावाहिनी दुर्गा देवी भी कहा जाता है। पुराणों में देवी के इस स्वरुप को कुमार कहकर संबोधित किया जाता है। माता का जन्म अत्याचारी दानवों का नाश करने के लिए हुआ था इसलिए वह  देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति पति बने थे।

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मां दुर्गा के स्कंदमाता स्वरूप की पूजा विधि

देवी स्कंदमाता की पूजा के लिए सबसे पहले चौकी पर तस्वीर स्थापित करें और फिर गंगा जल या गौमूत्र से शुद्धिकरण करें। कलश या घड़े में जल भरकर चौकी के पास रखें और फिर श्रीगणेश, नवग्रह, वरुण, षोडश सप्त घृत मातृका (सात सिंदूर की बिंदी लगाएं), मातृका (16 देवी) की स्थापना करें। व्रत, पूजन का संकल्प लेते हुए वैदिक व सप्तशती मंत्रों का जाप करें। मां को वस्त्र, सौभाग्य सूत्र, रोली-चंदन, सिंदूर, हल्दी, दुर्वा, बिल्वपत्र, आभूषण, फूलहार, धूप-दीप, नैवेद्य, फल, पान, दक्षिणा, आरती, फूल आदि अर्पित करें। इसके बाद मां को प्रसाद का भोग लगाएं।

कैसे करें मां को प्रसन्न

नवरात्रि के पांचवा दिन सफेद रंग के कपड़े पहनकर मां को प्रसन्न करें। साथ ही मां को भी सफेद रंग के फूल, चावल या प्रसाद अर्पित करें। इन्हें केले का भोग लगाया जाता है, ताकि भक्तों को अच्छी सेहत का आशीर्वाद मिले।

देवी स्कंदमाता का ध्यान मंत्र

वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कन्दमाता यशस्वनीम्।।
धवलवर्णा विशुध्द चक्रस्थितों पंचम दुर्गा त्रिनेत्रम्।
अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानांलकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल धारिणीम्॥
प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वांधरा कांत कपोला पीन पयोधराम्।
कमनीया लावण्या चारू त्रिवली नितम्बनीम्॥

देवी स्कंदमाता का स्तोत्र पाठ

नमामि स्कन्दमाता स्कन्दधारिणीम्।
समग्रतत्वसागररमपारपार गहराम्॥
शिवाप्रभा समुज्वलां स्फुच्छशागशेखराम्।
ललाटरत्नभास्करां जगत्प्रीन्तिभास्कराम्॥
महेन्द्रकश्यपार्चिता सनंतकुमाररसस्तुताम्।
सुरासुरेन्द्रवन्दिता यथार्थनिर्मलादभुताम्॥
अतर्क्यरोचिरूविजां विकार दोषवर्जिताम्।
मुमुक्षुभिर्विचिन्तता विशेषतत्वमुचिताम्॥
नानालंकार भूषितां मृगेन्द्रवाहनाग्रजाम्।
सुशुध्दतत्वतोषणां त्रिवेन्दमारभुषताम्॥
सुधार्मिकौपकारिणी सुरेन्द्रकौरिघातिनीम्।
शुभां पुष्पमालिनी सुकर्णकल्पशाखिनीम्॥
तमोन्धकारयामिनी शिवस्वभाव कामिनीम्।
सहस्त्र्सूर्यराजिका धनज्ज्योगकारिकाम्॥
सुशुध्द काल कन्दला सुभडवृन्दमजुल्लाम्।
प्रजायिनी प्रजावति नमामि मातरं सतीम्॥
स्वकर्मकारिणी गति हरिप्रयाच पार्वतीम्।
अनन्तशक्ति कान्तिदां यशोअर्थभुक्तिमुक्तिदाम्॥
पुनःपुनर्जगद्वितां नमाम्यहं सुरार्चिताम्।
जयेश्वरि त्रिलोचने प्रसीद देवीपाहिमाम्॥
 

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