14 AUGFRIDAY2026 4:50:07 PM
Nari

कल रखा जाएगा हरियाली तीज का व्रत, जानिए सुहागिनों के लिए क्यों खास है हरा रंग और झूला?

  • Edited By Priya Yadav,
  • Updated: 14 Aug, 2026 10:49 AM
कल रखा जाएगा हरियाली तीज का व्रत, जानिए सुहागिनों के लिए क्यों खास है हरा रंग और झूला?

नारी डेस्क:    सावन का महीना आते ही हरियाली तीज का इंतजार शुरू हो जाता है। सुहागिन महिलाओं के लिए यह पर्व खास महत्व रखता है। इस दिन महिलाएं पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से व्रत रखती हैं। वहीं, अविवाहित कन्याएं भी मनचाहा जीवनसाथी पाने की इच्छा से हरियाली तीज का व्रत करती हैं। इस पर्व की खास पहचान सिर्फ व्रत और पूजा तक सीमित नहीं है। हरे रंग के कपड़े और चूड़ियां पहनना, हाथों में मेहंदी सजाना और झूला झूलना भी हरियाली तीज की खूबसूरत परंपराओं का हिस्सा है। इस साल हरियाली तीज किस दिन मनाई जाएगी और हरे रंग व झूले का क्या महत्व है, आइए जानते हैं।

15 अगस्त को मनाई जाएगी हरियाली तीज

हरियाली तीज का व्रत सावन माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है। साल 2026 में तृतीया तिथि का आरंभ 14 अगस्त की शाम 6 बजकर 46 मिनट पर होगा और इसका समापन 15 अगस्त की शाम 5 बजकर 28 मिनट पर होगा।हिंदू धर्म में व्रत और त्योहारों के लिए उदयातिथि को विशेष महत्व दिया जाता है। इसी आधार पर इस साल हरियाली तीज का पर्व 15 अगस्त 2026 को मनाया जाएगा।

हरियाली तीज पर क्यों झूला झूलती हैं महिलाएं? जानिए इसके पीछे का सच

सुहागिनों के साथ कुंवारी कन्याएं भी रखती हैं व्रत

हरियाली तीज का व्रत मुख्य रूप से सुहागिन महिलाएं रखती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महिलाएं इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा कर पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं। मान्यता है कि इस व्रत से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति और प्रेम बना रहता है। वहीं, कई जगहों पर कुंवारी कन्याएं भी हरियाली तीज का व्रत रखती हैं। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से उन्हें मनचाहा और योग्य जीवनसाथी मिलने की कामना पूरी हो सकती है। इसी वजह से तीज का पर्व महिलाओं के लिए आस्था और उत्साह, दोनों का अवसर बन जाता है।

हरियाली तीज पर क्यों पहनते हैं हरे रंग के कपड़े?

हरियाली तीज के नाम में ही हरियाली का भाव जुड़ा हुआ है। सावन में बारिश के बाद प्रकृति चारों ओर हरे रंग की चादर ओढ़ लेती है। खेत, पेड़-पौधे और आसपास का वातावरण हराभरा नजर आता है। यही वजह है कि इस पर्व पर हरे रंग को विशेष महत्व दिया जाता है। धार्मिक मान्यताओं में हरे रंग को शुभता, समृद्धि, शांति और नई शुरुआत से जोड़कर देखा जाता है। यह रंग प्रकृति और उर्वरता का भी प्रतीक माना जाता है। इसलिए तीज के दिन महिलाएं हरे रंग की साड़ी, सूट या अन्य पारंपरिक परिधान पहनती हैं और हरे रंग की चूड़ियां भी पहनती हैं।

हरा रंग देता है ताजगी का एहसास

हरे रंग को लेकर केवल धार्मिक मान्यता ही नहीं, बल्कि आम जीवन में भी इसका अपना महत्व माना जाता है। प्रकृति में हरियाली देखने से मन को सुकून और ताजगी का अनुभव होता है। सावन में चारों तरफ हरियाली होने के कारण वातावरण भी खुशनुमा नजर आता है। इसी प्राकृतिक सुंदरता और सावन की हरियाली के साथ हरे रंग को जोड़कर हरियाली तीज की परंपरा विकसित हुई। इस दिन महिलाओं का हरे रंग के परिधानों और चूड़ियों में सजना पर्व की रौनक को और बढ़ा देता है।

ये भी पढ़ें:  फिल्म इंडस्ट्री की इस मशहूर एक्ट्रेस का निधन, A Christmas Story’ में निभाया था यादगार किरदार

हरियाली तीज पर क्यों झूला झूलती हैं महिलाएं?

हरियाली तीज की सबसे आकर्षक परंपराओं में झूला झूलना भी शामिल है। सावन में पेड़-पौधों पर नई हरियाली आने के बाद कई जगह पेड़ों की मजबूत डालियों पर झूले लगाए जाते हैं। महिलाएं और युवतियां समूह में झूला झूलती हैं और इस दौरान तीज के पारंपरिक गीत भी गाती हैं। कई क्षेत्रों में यह परंपरा आज भी सामूहिक उत्सव के रूप में निभाई जाती है। महिलाएं एक-दूसरे के घर या किसी सार्वजनिक स्थान पर इकट्ठा होती हैं, सजती-संवरती हैं और मिलकर तीज का त्योहार मनाती हैं।

भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन से जुड़ी है मान्यता

धार्मिक मान्यताओं में हरियाली तीज को भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन से जोड़कर देखा जाता है। कहा जाता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनके इसी समर्पण और तपस्या के बाद भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार किया।इसी कारण हरियाली तीज को पति-पत्नी के प्रेम, समर्पण और वैवाहिक सुख से जुड़ा पर्व माना जाता है। महिलाएं इस दिन माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा करके अपने दांपत्य जीवन की खुशहाली की कामना करती हैं।

PunjabKesari

राधा-कृष्ण से भी जोड़ी जाती है झूला झूलने की परंपरा

हरियाली तीज पर झूला झूलने की परंपरा को कुछ क्षेत्रों में राधा-कृष्ण से भी जोड़कर देखा जाता है। खासकर ब्रज और वृंदावन की परंपराओं में सावन के दौरान झूलों का विशेष महत्व है। मान्यता है कि सावन में राधा रानी और श्रीकृष्ण के झूला झूलने की लीलाओं का उत्सव मनाया जाता है। इसी वजह से सावन के दिनों में मंदिरों और घरों में भी झूला सजाने की परंपरा देखने को मिलती है। फूलों से सजे झूले, तीज के गीत और महिलाओं का सामूहिक उत्सव इस पर्व के माहौल को खास बना देते हैं।

झूला झूलने से जुड़ा है खुशी और सुकून का भाव

झूला झूलना केवल धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि इसे सावन के आनंद और उत्सव से भी जोड़कर देखा जाता है। बारिश के मौसम में प्रकृति के बीच झूला झूलना लोगों को खुशी और मानसिक सुकून का अनुभव कराता है। आज भले ही शहरों में पेड़ों पर झूले लगाने की परंपरा पहले जैसी आम नहीं रही हो, लेकिन हरियाली तीज के अवसर पर कई जगह सामूहिक रूप से झूला उत्सव आयोजित किए जाते हैं। इस तरह पुरानी परंपरा आधुनिक समय में भी अपनी अलग पहचान बनाए हुए है।

नोट: हरियाली तीज की तिथि और पूजा से जुड़े समय स्थान के अनुसार अलग हो सकते हैं। व्रत रखने से पहले स्थानीय पंचांग या विद्वान से समय की पुष्टि करना उचित है।
  
 
 

Related News