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किस उम्र के बच्चों को Autism का रिस्क ज्यादा?

  • Edited By Priya Yadav,
  • Updated: 02 Apr, 2026 10:53 AM
किस उम्र के बच्चों को Autism का रिस्क ज्यादा?

नारी डेस्क:  हर साल 2 अप्रैल को World Autism Awareness Day मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य लोगों को ऑटिज्म के बारे में जागरूक करना है। ऑटिज्म, जिसे Autism Spectrum Disorder (ASD) भी कहा जाता है, एक न्यूरोडेवलपमेंटल डिसऑर्डर है। इसका मतलब है कि यह बच्चे के दिमाग के विकास को प्रभावित करता है। इससे बच्चे के बोलने, समझने, सीखने और दूसरों से जुड़ने के तरीके पर असर पड़ता है। ऐसे बच्चे दुनिया को थोड़ा अलग तरीके से देखते और समझते हैं।

किस उम्र के बच्चों में ऑटिज्म के लक्षण दिखते हैं?

ऑटिज्म के लक्षण आमतौर पर बच्चे के जीवन के शुरुआती 2 से 3 साल के अंदर दिखाई देने लगते हैं। कुछ बच्चों में यह संकेत 12 से 18 महीने की उम्र में भी नजर आने लगते हैं। जैसे कि बच्चा आंखों में आंखें डालकर बात नहीं करता, नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया नहीं देता, बोलने में देरी होती है या बार-बार एक ही तरह का व्यवहार करता है। अगर इन संकेतों को समय रहते पहचान लिया जाए, तो बच्चे के विकास में काफी सुधार किया जा सकता है। इसलिए शुरुआती उम्र में बच्चों के व्यवहार पर ध्यान देना बहुत जरूरी है।

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 किन बच्चों में ऑटिज्म का खतरा ज्यादा होता है?

डॉक्टरों के अनुसार, ऑटिज्म का कोई एक कारण नहीं होता, बल्कि कई कारण मिलकर इसका खतरा बढ़ाते हैं। अगर परिवार में पहले से किसी को ऑटिज्म है, तो बच्चे में इसका जोखिम बढ़ सकता है, जिसे जेनेटिक फैक्टर कहा जाता है। गर्भावस्था के दौरान मां की सेहत भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अगर प्रेग्नेंसी के समय मां को कोई इंफेक्शन हो जाए, सही पोषण न मिले या कुछ दवाओं का असर पड़े, तो बच्चे के दिमाग के विकास पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा समय से पहले जन्मे (प्रिमेच्योर) बच्चे और कम वजन वाले बच्चों में भी ऑटिज्म का खतरा ज्यादा होता है। देखा गया है कि लड़कों में यह समस्या लड़कियों की तुलना में ज्यादा पाई जाती है।

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 क्या ऑटिज्म का परमानेंट इलाज संभव है?

ऑटिज्म को पूरी तरह ठीक (क्योर) करना संभव नहीं है, लेकिन सही समय पर पहचान और थेरेपी के जरिए इसे काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है। जितनी जल्दी इलाज शुरू होता है, उतना बेहतर परिणाम मिलता है। बिहेवियरल थेरेपी से बच्चे के व्यवहार और सामाजिक कौशल में सुधार होता है। स्पीच थेरेपी बोलने और समझने की क्षमता को बेहतर बनाती है। ऑक्यूपेशनल थेरेपी से बच्चा रोजमर्रा के काम करना सीखता है। इसके अलावा स्पेशल एजुकेशन प्रोग्राम बच्चे की जरूरत के हिसाब से पढ़ाई में मदद करते हैं। सही गाइडेंस मिलने पर ऑटिज्म से प्रभावित बच्चे भी सामान्य और खुशहाल जीवन जी सकते हैं।

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 क्या ऑटिज्म से बचाव संभव है?

ऑटिज्म को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन कुछ बातों का ध्यान रखकर इसके खतरे को कम किया जा सकता है। गर्भावस्था के दौरान मां को संतुलित और पौष्टिक आहार लेना चाहिए और नियमित चेकअप करवाना चाहिए। फोलिक एसिड और जरूरी सप्लीमेंट्स डॉक्टर की सलाह से लेने चाहिए।इसके साथ ही शराब, धूम्रपान और बिना डॉक्टर की सलाह के दवाओं से दूरी बनानी चाहिए। बच्चे के जन्म के बाद उसके विकास पर नजर रखें। अगर बोलने, चलने या व्यवहार में देरी दिखे, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें। समय-समय पर टीकाकरण और हेल्थ चेकअप भी जरूरी है। ऑटिज्म कोई लाइलाज बीमारी नहीं है, लेकिन इसे पूरी तरह खत्म भी नहीं किया जा सकता। सही समय पर पहचान, माता-पिता की जागरूकता और विशेषज्ञों की मदद से बच्चे के जीवन में बड़ा सुधार लाया जा सकता है। जितनी जल्दी कदम उठाए जाएंगे, बच्चे का भविष्य उतना ही बेहतर हो सकता है।
 

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