नारी डेस्क: कई बार बच्चे जन्म से ही सुनने में असमर्थ होते हैं और उनके भीतर सुनने की क्षमता विकसित नहीं हो पाती। ऐसे में यह समस्या लंबे समय तक चुनौती बनी रहती है। लेकिन अब इस दिशा में एक अच्छी खबर सामने आई है। जिन लोगों को बचपन से सुनने में दिक्कत है, उनके लिए उम्मीद जगी है कि उनकी सुनने की क्षमता वापस लाई जा सकती है। आइए जानते हैं, यह कैसे संभव हो सकता है।
क्या है कंजेनिटल डेफनेस और क्यों होती है समस्या
कंजेनिटल डेफनेस वह स्थिति होती है, जिसमें बच्चा जन्म से ही सुनने में असमर्थ होता है। इसका असर उसके बोलने, समझने और रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है। ज्यादातर मामलों में इसके पीछे जेनेटिक कारण होते हैं, यानी कुछ खास जीन में बदलाव जो पीढ़ियों के जरिए आगे बढ़ते हैं। अब तक इसके इलाज के लिए हियरिंग एड या कॉक्लियर इम्प्लांट जैसे विकल्प ही मौजूद थे, जो मदद तो करते हैं, लेकिन प्राकृतिक सुनने की क्षमता पूरी तरह वापस नहीं ला पाते।

स्वीडन की रिसर्च ने जगाई नई उम्मीद
हाल ही में स्वीडन के करोलिंस्का इंस्टिट्यूट की एक स्टडी ने इस दिशा में बड़ा बदलाव लाने की उम्मीद जगाई है। यह रिसर्च प्रतिष्ठित जर्नल Nature में प्रकाशित हुई है। इसमें बताया गया है कि जीन थेरेपी के जरिए एक खास तरह के जेनेटिक बहरेपन का प्रभावी इलाज संभव हो सकता है।
कैसे किया गया यह प्रयोग
इस शोध में चीन के अस्पतालों और विश्वविद्यालयों के सहयोग से 1 से 24 साल के 10 मरीजों पर परीक्षण किया गया। इन सभी में सुनने की समस्या OTOF जीन में बदलाव के कारण थी। यह जीन ‘ओटोफरलिन’ नाम के प्रोटीन को बनाने में मदद करता है, जो कान से दिमाग तक आवाज के सिग्नल पहुंचाने में अहम भूमिका निभाता है। जब यह प्रोटीन सही से काम नहीं करता, तो व्यक्ति आवाज महसूस तो करता है, लेकिन दिमाग तक सिग्नल ठीक से नहीं पहुंच पाता, जिससे सुनने में दिक्कत होती है।
इस थेरेपी ने कैसे किया कमाल
इस समस्या के समाधान के लिए वैज्ञानिकों ने जीन थेरेपी का सहारा लिया। इसमें एक स्वस्थ जीन को शरीर में पहुंचाया गया। इसके लिए एडेनो-असोसिएटेड वायरस नाम के सुरक्षित वायरस का इस्तेमाल किया गया, जो काम करने वाला OTOF जीन सीधे कान के अंदर पहुंचाता है। यह प्रक्रिया कॉक्लिया के एक हिस्से, जिसे राउंड विंडो कहा जाता है, वहां एक छोटे इंजेक्शन के जरिए की गई।

चौंकाने वाले नतीजे, कुछ ही हफ्तों में दिखा असर
इस थेरेपी के नतीजे बेहद उत्साहजनक रहे। कई मरीजों ने एक महीने के भीतर ही सुनने में सुधार महसूस करना शुरू कर दिया। छह महीने के अंदर सभी मरीजों में स्पष्ट रूप से फर्क देखा गया। वे पहले की तुलना में बहुत धीमी आवाजें भी सुन पाने लगे।
बच्चों में सबसे ज्यादा फायदा
इस शोध में एक खास बात यह सामने आई कि बच्चों में इसका असर सबसे ज्यादा देखा गया, खासकर 5 से 8 साल की उम्र के बीच। एक छोटी बच्ची ने तो इलाज के कुछ महीनों के भीतर लगभग सामान्य सुनने की क्षमता हासिल कर ली और अपनी मां से आसानी से बातचीत करने लगी।
समय पर इलाज से मिल सकते हैं बेहतर परिणाम
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस तरह की थेरेपी समय रहते दी जाए, तो इसके परिणाम और भी बेहतर हो सकते हैं। यह खोज भविष्य में उन लाखों बच्चों के लिए उम्मीद बन सकती है, जो जन्म से ही सुनने की समस्या से जूझ रहे हैं। जीन थेरेपी पर हुई यह रिसर्च सिर्फ एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि उन परिवारों के लिए राहत की खबर है, जो वर्षों से इस समस्या का समाधान ढूंढ रहे थे। आने वाले समय में अगर यह तकनीक बड़े स्तर पर उपलब्ध होती है, तो यह सच में कई जिंदगियां बदल सकती है।
