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नेत्रहीन समाज की सहानुभूति नहीं, सहयोग चाहते हैं-सारा जॉनसन

नेत्रहीन समाज की सहानुभूति नहीं, सहयोग चाहते हैं-सारा जॉनसन
Views:- Saturday, April 5, 2014-8:46 AM

भगवान की बनाई दुनिया बहुत सुंदर है, प्रत्येक मनुष्य जो इस संसार में है, उसकी सर्वश्रेष्ठ कलाकृति है। वहीं इस संसार में कुछ ऐसे व्यक्ति भी हैं, जो दृष्टिहीनता या विकलांगता के कारण दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं जिन्हें समाज सहानुभूति की दृष्टि से तो देखता है परन्तु कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो उनके इस दुख को समझ कर उसमें शामिल होते हैं। वे न केवल उनका साथ देते हैं, बल्कि उन्हें विश्वास भी दिलाते हैं कि वे भी किसी के मोहताज नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर बन सकते हैं। ऐसा ही विश्वास लुधियाना स्थित वी.आर.टी.सी. फॉर ब्लाइंड वोकेशनल रिहैब्लिटेशन ट्रेनिंग सैंटर की डायरैक्टर सारा जॉनसन कई वर्षों से प्रदान कर रही हैं। पेश हैं उनसे बातचीत के कुछ अंश :

सारा जी, क्या आप पंजाब से ही संबंध रखती हैं?
—जी नहीं, मेरा जन्म कन्याकुमारी के नागरकोली नामक गांव में हुआ। पिता कुमार हिन्दू थे व माता कैथोलिक ईसाई थीं। प्राइमरी शिक्षा नागरकोली में हुई व बाद में चेन्नई में ग्रैजुएशन व टीचर ट्रेनिंग की।

आप इस संस्था के साथ कहां से जुड़ीं?
—ग्रैजुएशन पूरी करने के बाद चेन्नई में दो-तीन वर्ष अध्यापक के रूप में कार्य किया। फिर 1967 में डा. ई.एम. जॉनसन से मेरी शादी हुई जो सैंट्रल गवर्नमैंट में कर्मचारी थे परन्तु तेज बुखार के कारण उनकी दोनों आंखों की रोशनी चली गई। तब शायद हमें नहीं पता था कि भगवान कितने ऐसे दृष्टिहीन लोगों की मदद के लिए हमें चुना। अमेरिका के विकलांग दृष्टिहीन लोगों के लिए एक प्रोजैक्ट, जो सी.एम.सी. अस्पताल लुधियाना में लगाया गया था, के लिए मैंने अपने पति के साथ काम किया। जब 6-7 वर्ष के बाद यह प्रोजैक्ट पूर्ण हुआ तो कृष्ठ रोगियों के लिए चलाए प्रोजैक्ट के लिए हम वेल्लूर चले गए थे। वहां कुछ देर कार्य किया।

लुधियाना में इस संस्थान की स्थापना कैसे हुई?
—अमेरिका में डा. विक्टर सी. रैम्बो ने वेल्लूर में काम करते हुए मेरे पति को तार भेजा कि आपको पंजाब में नेत्रहीनों की सेवा के लिए काम करना है इसलिए आप लुधियाना आ जाएं। उसके बाद हम लुधियाना आ गए।

लुधियाना आने पर किन-किन परेशानियों का सामना करना पड़ा?
—जब हम लुधियाना आए तो पंजाब के प्रसिद्ध लोक गायक यमला जट्ट ने अपने घर में एक कमरा हमें रहने के लिए दिया। नई व्यवस्था व इस संस्थान को स्थापित करने में काफी दिक्कतें आई। फिर बाद में डा. विक्टर रैम्बो ने वित्तीय सहायता भेजी। रोटरी क्लब, श्री ब्रिज मोहन मुंजाल व कई अन्य लोगों ने सहायता के लिए हाथ बढ़ाया। क्रिस्टीफल ब्लाइंड्ज मिशन जर्मनी ने संस्थान की जमीन खरीदने में मदद की। तब एक कमरा बना कर इस संस्थान की शुरूआत हुई।

आपके इस संस्थान में कितने विद्यार्थी हैं और कहां से हैं?

—हमारे संस्थान में इस समय 195 दृष्टिहीन विद्यार्थी हैं। जहां उनकी पढ़ाई के साथ-साथ कम्प्यूटर, संगीत व अन्य कई विशेष कोर्स करवाए जाते हैं। हमारे संस्थान में न केवल पंजाब अपितु दूसरे प्रदेशों से भी विद्यार्थी आते हैं।

इतने बड़े संस्थान के प्रबंध के लिए फंड्स का प्रबंध कैसे होता है?
—इतना बड़ा संस्थान कोई अकेले नहीं चला सकता। हमारे संस्थान की प्रबंधन समिति जिसके चेयरमैन बी.डी. अरोड़ा जी हैं व अन्य सदस्य भी संस्थान के लिए फंड का प्रबंध अपने स्तर पर करते हैं। इसके साथ बृज मोहन मुंजाल जी, रोटरी क्लब, कई महिला समितियां, कई सामाजिक संस्थाएं व शहर के कई दानी सज्जनों के सहयोग से यह संस्थान चल रहा है। जैसे इसी वर्ष पद्मश्री विभूषित व पंजाब केसरी के मुख्य सम्पादक विजय कुमार चोपड़ा जी की प्रेरणा से शहर की प्रमुख सामाजिक संस्था आधार द फाऊंडेशन के फैंटा बांसल ने हमारे स्कूल के बच्चों की सुविधा के लिए स्कूल वैन भेंट की है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की लुधियाना शाखा द्वारा ब्रेल लिपि से सुसज्जित कम्प्यूटर लैब बनवा कर दी गई है।

सरकारी तौर पर भी क्या आपके संस्थान को मदद मिलती है?
—जी हां, सरकार की तरफ से भी अनुदान मिलता है व कोई परेशानी होती है तो भी सरकार मदद करती है  लेकिन एक बात जरूरी है कि सरकारी नौकरियों में नेत्रहीनों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करने चाहिएं। इसके साथ-साथ निजी क्षेत्र में भी औद्योगिक घरानों को उन्हें रोजगार देना चाहिए। इन्हें केवल आपकी सहानुभूति या दया नहीं चाहिए, इन्हें आपका सहयोग चाहिए ताकि वे भी अपने सामर्थ्य का सदुपयोग करें व साज को योगदान दें। नेत्रहीनों की उच्च शिक्षा के लिए कॉलेज या अन्य संस्थानों की अलग से आवश्यकता है।

अपनी जिंदगी में आप इस सेवा कार्य के लिए किससे प्रभावित रही हैं?
—मैं अपने पति स्वर्गीय डा. ई.एम. जॉनसन से प्रभावित रही हूं। मैंने उनकी सेवा करने की ललक को समझा व करीब से देखा है। वह हमेशा दूसरे की मदद को तत्पर रहते थे। उनका मानना था कि दुखियों व मानवता की सेवा ही सच्ची ईश्वर भक्ति है।

क्या आपके द्वारा किए जा रहे इस महान सेवा कार्य को लोगों द्वारा सराहा जाता है?
—जी हां, समाज में सदैव ही अच्छे कार्य करने वालों को सराहा जाता है। मुझे भी समाज सेवा के इस कार्य के लिए समय-समय पर विभिन्न मंचों से समाज से जुड़े लोगों ने मान-सम्मान दिया है जिनमें प्रमुख तौर पर मदर टैरेसा अवार्ड, शान-ए-पंजाब, वुमैन अवार्ड, आधार द फाऊंडेशन द्वारा नारी शक्ति अवार्ड्स देकर मुझे और प्रोत्साहित किया गया।

                                                                                                                          प्रस्तुति : रवि नंदन शर्मा, लुधियाना