
शादी के समय अंगूठी बाएं हाथ की चौथी उंगली में पहनाई जाती है। अंगूठी की तरफ से चौथी और दूसरी तरफ से दूसरे नंबर की उंगली में ही शादी की अंगूठी पहनाई जाती है। खास बात ये है कि भारत में ही नहीं, विदेश में भी वेडिंग रिंग इसी उंगली में पहनी जाती है, तो जानते हैं ऐसा क्यों होता है और आखिरी शादी की अंगूठी की जगह फीक्स होती है...

शादी की अंगूठी हमेशा हाथ की चौथी उंगूली में ही पहनाई जाती है और ये विदेश में भी फॉलो किया जाता है। वैसे अब लोग जिस तरह से कंफर्टेबल रहते हैं, उस हिसाब से दाएं या बाएं हाथ का चयन करते हैं और अलग-अलग हाथों में अंगूठी पहने रहते हैं।
ऐसा क्यों है?
शादी की अंगूठी या वेडिंग रिंग का इतिहास बहुत पुराना है। रीडर डाइजेस्ट में कहा गया है कि शादी की रिंग का इतिहास प्राचीन मिस्त्र का है, क्योंकि पुरातत्विदों को कई चित्रलिपि में इस बात के प्रमाण मिले हैं कि दुल्हनें अंगूठी पहनती हैं। वहीं कई प्राचीन संस्कृतियों में भी शादी की अंगूठियां पहनने की कहानी हैं और प्राचीन यूनानियों और रोमानों के समय से लोग अपनी अंगूठी पहनते थे।

कई धर्मों में अलग है रिंग पहनाने का रिवाज
ईसाई धर्म के अलावा कई ऐसे धर्म भी हैं, जिनमें अंगूठी पहनना जरूरी नहीं और अगर है भी तो उसे चौथी उंगली में ही पहनना जरूरी नहीं है। जैसे यहूदियों में शादी की रस्में हो जाने के बाद अंगूठी को दूसरे उंगली में शिफ्ट किया जा सकता है और रस्म के वक्त तर्जनी उंगली में अंगूठी पहनी जाती है। इस्लाम या सनातन धर्म में भी अनिवार्य रूप से अंगूठी पहनने की परंपरा नहीं है। हालांकि भारत तेजी से बाहरी देशों की परंपरा को अपना रहा है और लोग शादी से पहले रिंग सेरेमनी भी करने लगे हैं।
दिल से हैं रिंग फिंगर का खास कनेक्शन
प्राचीन समय में, यह माना जाता था कि बाएं हाथ की चौथी उंगली में एक नस थी जो सीधे आपके दिल तक जाती थी। इस वजह से इसे दिल की भावनाओं को केंद्र माना जाता था। इसे वेन ऑफ लव कहा जाता था। ऐसे में इस वेन ऑफ लव की उंगुली में अंगूठी को पहना जाता है। हालांकि, कई रिपोर्ट्स में सामने आ चुका है कि शरीर में ऐसी कोई नस नहीं होती है कि जो सीधे हाथ से हार्ट को मिल जाती है।

रिंग को चौथी उंगली में पहनने की परंपरा
वहीं अंगूठी को कौन-से हाथ की उंगली में पहनना है इसपर बहस करीब 450 साल पहले ब्रिटेन में शुरू हुई थी। साल 1549 में एंगलिकन चर्च ने खुद को कैथोलिक चर्च और उनकी मान्यताओं से अलग किया। साथ ही उन्होंने उनके तौर-तरीकों को भी बदला। जहां कौथोलिक चर्च के अनुसार, अंगूठी को दाएं हाथ की चौथी उंगली पर पहनना चाहिए। वहीं एंगलिकन चर्च ने उसे बाएं हाथ की चौथी उंगली में पहनने की शुरुआत की और धीरे-धीरे ये प्रचलन पूरी दुनिया में फैल गया।