12 AUGWEDNESDAY2026 9:32:38 PM
Nari

20 साल के बाद Kidney Check-up होगा जरूरी! संसदीय समिति ने की बड़ी सिफारिश

  • Edited By Priya Yadav,
  • Updated: 12 Aug, 2026 09:51 AM
20 साल के बाद Kidney Check-up होगा जरूरी! संसदीय समिति ने की बड़ी सिफारिश

नारी डेस्क: किडनी हमारे शरीर का एक बेहद जरूरी अंग है, जो खून को साफ करने से लेकर शरीर में पानी और जरूरी मिनरल्स का संतुलन बनाए रखने तक कई अहम काम करती है। लेकिन आजकल बदलती लाइफस्टाइल, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्याओं के चलते किडनी की बीमारियों का खतरा भी बढ़ रहा है। चिंता की बात यह है कि शुरुआत में किडनी की खराबी के लक्षण अक्सर साफ नजर नहीं आते। ऐसे में समय-समय पर जांच ही बीमारी को शुरुआती दौर में पकड़ने का बेहतर तरीका हो सकती है। इसी को देखते हुए संसदीय समिति ने 20 साल की उम्र के बाद हर छह महीने में Kidney Check-up कराने की बड़ी सिफारिश की है।

20 साल की उम्र के बाद हर छह महीने में किडनी जांच का सुझाव

किडनी से जुड़ी गंभीर बीमारियों के बढ़ते मामलों को देखते हुए समिति ने 20 वर्ष या उससे अधिक उम्र के सभी लोगों की हर छह महीने में किडनी फंक्शन टेस्ट कराने की सिफारिश की है। समिति का मानना है कि नियमित जांच से किडनी की खराबी को शुरुआती चरण में ही पहचाना जा सकेगा और समय रहते इलाज शुरू किया जा सकेगा। समिति ने खास तौर पर अधिक जोखिम वाले लोगों की नियमित निगरानी पर जोर दिया है। इनमें मधुमेह और हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित लोग प्रमुख रूप से शामिल हैं। ऐसे लोगों की समय-समय पर जांच कराने की व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत बताई गई है।

बीपीएल परिवारों को साल में दो बार मुफ्त जांच

संसदीय समिति ने गैर-संचारी रोगों की रोकथाम और नियंत्रण के लिए चलाए जा रहे राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत गरीब परिवारों को राहत देने की भी सिफारिश की है। इसके मुताबिक गरीबी रेखा से नीचे यानी बीपीएल परिवारों के लोगों को साल में दो बार किडनी की जांच मुफ्त उपलब्ध कराई जानी चाहिए। वहीं, गरीबी रेखा से ऊपर के लोगों के लिए भी यह जांच बहुत कम दर पर उपलब्ध कराने का सुझाव दिया गया है, ताकि खर्च अधिक होने के कारण लोग जरूरी जांच से दूर न रहें।

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ईजीएफआर और यूरिन टेस्ट पर जोर

समिति ने कहा है कि अधिक जोखिम वाले लोगों की जांच केवल सामान्य परीक्षण तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसमें एस्टिमेटेड ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट (eGFR) के साथ यूरिन एल्ब्यूमिन या प्रोटीन टेस्ट भी शामिल किया जाना चाहिए। इन जांचों से किडनी की कार्यक्षमता और उसमें होने वाली संभावित गड़बड़ी का पता लगाने में मदद मिलती है। इसके साथ ही समिति ने सही समय पर मरीज को विशेषज्ञ या संबंधित स्वास्थ्य केंद्र तक रेफर करने और उसके बाद फॉलो-अप की व्यवस्था सुनिश्चित करने की जरूरत भी बताई है।

हर साल 2.2 लाख नए मरीज, डायलिसिस की बढ़ती मांग

रिपोर्ट में किडनी की गंभीर बीमारी के बोझ को लेकर भी चिंता जताई गई है। समिति के अनुसार, देश में हर साल किडनी की बीमारी के अंतिम चरण यानी एंड-स्टेज किडनी डिजीज के करीब 2.2 लाख नए मरीज सामने आते हैं। इन मरीजों के इलाज के लिए हर साल लगभग 3.4 करोड़ अतिरिक्त डायलिसिस सत्रों की जरूरत पड़ती है। ऐसे में समिति ने बीमारी की रोकथाम, शुरुआती पहचान और समय पर इलाज को जरूरी बताया है, ताकि गंभीर अवस्था तक पहुंचने वाले मरीजों की संख्या कम की जा सके।

रोकथाम और इलाज को लेकर 66 सिफारिशें

राज्यसभा सदस्य राम गोपाल यादव की अध्यक्षता वाली संसदीय स्थायी समिति ने देश में किडनी की गंभीर बीमारियों की व्यापकता, रोकथाम, पहचान, उपचार और प्रबंधन को लेकर कुल 66 सिफारिशें की हैं। समिति का जोर इस बात पर है कि बीमारी का पता गंभीर स्थिति में पहुंचने के बाद नहीं, बल्कि शुरुआती स्तर पर लगाया जाए। इसके लिए नियमित स्क्रीनिंग, जांच, रेफरल और मरीजों की लगातार निगरानी की व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत बताई गई है।

कैंसर को अधिसूचित बीमारी घोषित करने का निर्देश

कैंसर के मामलों को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने अहम निर्देश दिया है। मंगलवार को शीर्ष अदालत ने देश के 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कैंसर को अधिसूचित बीमारी घोषित करने का निर्देश दिया। इसका उद्देश्य कैंसर के नए मामलों की समय पर जानकारी जुटाना और मरीजों को बेहतर तथा समयबद्ध इलाज उपलब्ध कराने की व्यवस्था मजबूत करना है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार से यह भी पूछा कि सभी राज्यों के लिए अनिवार्य दिशा-निर्देश क्यों जारी नहीं किए जा रहे हैं, जिससे पूरे देश में कैंसर को लेकर एक समान नीति लागू हो सके।

36 में से 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पहले ही अधिसूचित

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि संसदीय समिति की रिपोर्ट में की गई सिफारिशों के बाद अब तक 36 में से 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने कैंसर को अधिसूचित बीमारी घोषित कर दिया है। यह मामला जाने-माने डॉक्टर अनुराग श्रीवास्तव की जनहित याचिका से जुड़ा है। अदालत के निर्देश का मकसद कैंसर के मामलों की बेहतर निगरानी और मरीजों तक समय पर उपचार पहुंचाने की व्यवस्था को मजबूत करना है।

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कैंसर को अधिसूचित बीमारी घोषित करने से क्या बदलेगा?

कैंसर को अधिसूचित बीमारी घोषित किए जाने के बाद अस्पतालों, डॉक्टरों और लैबोरेटरी के लिए कैंसर के हर नए मामले की जानकारी सरकार को देना कानूनी रूप से अनिवार्य हो जाएगा। इससे देश में कैंसर के मामलों का अधिक सटीक आंकड़ा उपलब्ध हो सकेगा। सरकार को यह समझने में भी मदद मिलेगी कि अलग-अलग क्षेत्रों में बीमारी की स्थिति क्या है और किस स्तर पर स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरत है। उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर मरीजों की समय पर पहचान, उपचार की योजना और स्वास्थ्य सेवाओं की तैयारी बेहतर तरीके से की जा सकेगी।

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तीन सितारा होटल से ज्यादा नहीं होना चाहिए अस्पताल के सामान्य कमरे का किराया

निजी अस्पतालों में इलाज के दौरान कमरे के भारी किराये को लेकर भी संसदीय समिति ने सवाल उठाया है। समिति ने सिफारिश की है कि बड़े शहरों में निजी अस्पतालों के सामान्य कमरे का किराया आसपास के तीन सितारा होटलों के औसत किराये से अधिक नहीं होना चाहिए। समिति की यह सिफारिश केवल कमरे के किराये पर लागू होगी। अस्पताल डॉक्टर की फीस, नर्सिंग, इस्तेमाल होने वाली चिकित्सा सामग्री, भोजन और कपड़े धोने जैसी सेवाओं के खर्च अलग से ले सकेंगे।

एक ही इलाज के लिए कमरे की कैटेगरी बदलने पर ज्यादा बिल क्यों?

समिति ने निजी अस्पतालों के बिलों की जांच के दौरान कमरे के किराये में काफी अंतर पाया। रिपोर्ट में कहा गया है कि इसका सीधा असर मरीजों और उनके परिवारों की जेब पर पड़ता है। समिति ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि एक ही बीमारी के इलाज, ऑपरेशन या मेडिकल प्रक्रिया के लिए मरीज से केवल कमरे की कैटेगरी बदलने के कारण इलाज का पैकेज अधिक क्यों लिया जाए। अगर डॉक्टर, ऑपरेशन और मेडिकल प्रक्रिया एक ही है, तो सामान्य वार्ड से प्राइवेट या डीलक्स कमरे में जाने पर इलाज की कुल कीमत में बड़ा अंतर होने का औचित्य क्या है, इस पर समिति ने सवाल उठाया है।

समिति की सिफारिशों का व्यापक उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ और पारदर्शी बनाना है। किडनी की बीमारी की शुरुआती जांच से लेकर कैंसर के मामलों की अनिवार्य रिपोर्टिंग और निजी अस्पतालों के कमरे के किराये पर नियंत्रण जैसे सुझाव सीधे तौर पर मरीजों और उनके परिवारों पर पड़ने वाले आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी बोझ को कम करने से जुड़े हैं।  

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