
नारी डेस्क: बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा बेंच ने गुरुवार को तहलका मैगज़ीन के पूर्व एडिटर तरुण तेजपाल को 2013 के यौन हमले के मामले में 10 साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई। यह मामला उनकी एक जूनियर सहयोगी ने दर्ज कराया था। यह कथित घटना एक दशक से भी पहले हुई थी और ट्रायल कोर्ट द्वारा उन्हें बरी किए जाने के फैसले को गोवा सरकार ने चुनौती दी थी, जिसके कई साल बाद यह सज़ा सुनाई गई है।

ये है पूरा मामला
यह मामला नवंबर 2013 का है, जब तहलका के साथ काम करने वाली एक महिला पत्रकार ने तेजपाल पर आरोप लगाया था कि उन्होंने 7 और 8 नवंबर को गोवा के एक होटल की लिफ्ट में उनके साथ यौन हमला किया था। तेजपाल को 30 नवंबर 2013 को गिरफ्तार किया गया था और बाद में सितंबर 2017 में उन पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे, जिनमें रेप, यौन उत्पीड़न और गलत तरीके से बंधक बनाना शामिल था। मई 2021 में, गोवा सेशंस कोर्ट ने तेजपाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया था।
पहले बरी हो गए थे तरुण तेजपाल
कोर्ट ने कहा था कि शिकायतकर्ता ने ऐसा कोई सामान्य व्यवहार नहीं दिखाया जो यौन उत्पीड़न की शिकार महिला संभवतः दिखा सकती है। कोर्ट ने मेडिकल सबूतों की कमी और शिकायतकर्ता व तेजपाल के बीच हुए मैसेज का हवाला दिया था, जिनके बारे में कोर्ट ने कहा कि वे सदमे (ट्रॉमा) के उसके दावे का समर्थन नहीं करते हैं। कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था कथित तौर पर हुए यौन शोषण के बाद की तस्वीर को देखने पर युवती "मुस्कुराती हुई, खुश, सामान्य और अच्छे मूड में दिखी थी"। कोर्ट ने कहा था- "वो किसी तरह से परेशान, संकोच करती हुई या डरी-सहमी हुई नहीं दिखी"। गोवा सरकार ने इस बरी किए जाने के फ़ैसले को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी। गुरुवार को हाई कोर्ट की गोवा बेंच ने तेजपाल को सभी आरोपों में दोषी ठहराया और उन्हें 10 साल की सज़ा सुनाई, साथ ही सरेंडर करने के लिए चार हफ़्ते का समय दिया।

हर महिला को इंकार करने का हक: कोर्ट
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के 'आदर्श पीड़ित' वाली सोच की आलोचना की। हाईकोर्ट ने कहा कि यह जरूरी नहीं है कि हर दुष्कर्म पीड़िता लाचार और कमजोर दिखे। अदालत ने कहा- हर महिला को किसी के भी साथ यौन संबंध बनाने से इनकार करने का अधिकार है। हाईकोर्ट ने अपने 81 पन्नों के फैसले में कहा कि मापुसा की ट्रायल कोर्ट ने इस धारणा के साथ कार्यवाही की कि यौन उत्पीड़न की शिकार महिला को एक खास तरह से व्यवहार करना चाहिए और इस मामले में पीड़िता को एक 'आदर्श पीड़िता' (परफेक्ट विक्टिम) होना चाहिए था। कोर्ट ने इस बात पर कड़ी नाराजगी जताई कि बचाव पक्ष ने पीड़िता को कटघरे में खड़ा किया और उसकी निजी जिंदगी पर ध्यान केंद्रित किया।