
नारी डेस्क: आज सावन के पहले मंगलवार को मां मंगला गौरी का व्रत सुहागिन महिलाओं द्वारा अखंड सौभाग्य और पति की लंबी उम्र के लिए रखा गया। इस दिन माता पार्वती के मंगला गौरी स्वरूप की विधि-विधान से पूजा की जाती है। आज हम मां मंगला गौरी के रहस्यमयी मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां हजारों साल से ज्योत जल रही है। यहां मां सती की पूजा ‘मंगला गौरी’ के रूप में की जाती है।

यहां गिरा था मां गौरी का वक्षस्थल
बिहार के गया शहर से कुछ ही दूरी पर भस्मकुट पर्वत पर शक्ति पीठ मां मंगला गौरी का मंदिर है, जहां अदभुत प्रतिमा स्थापित है। मान्यता है, कि यहां मां सती का वक्ष स्थल (स्तन) गिरा था, जिस कारण यह शक्तिपीठ 'पालनहार पीठ' या 'पालनपीठ' के रूप में प्रसिद्ध है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव जब माता पार्वती के जलते शरीर को लेकर तांडव करते हुए आकाश मार्ग से चल पड़े, तब उनके रौद्र रूप को शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र चलाकर मां पार्वती के शरीर के कई टुकड़े कर दिए। जहां-जहां माता पार्वती के शरीर के टुकड़े गिरे, वह स्थल शक्तिपीठ कहलाया। गया शहर के भस्मकुट पर्वत पर माता सती का वक्षस्थल गिरा, जो मंगला गौरी शक्ति पीठ के रूप में जाना जाता है।

कई वर्षों से जल रही है अखंड ज्योति
मंदिर के अंदर कई वर्षों से अखंड ज्योति जल रही है, जिसके दर्शन कर श्रद्धालु पूजा-पाठ करते हैं। खास बात यह है कि आज भी गर्भगृह में बिजली का उपयोग नहीं किया जाता और श्रद्धालु इसी दिव्य ज्योति के प्रकाश में माता के दर्शन करते हैं। मंदिर के पुजारी ने बताया कि मां मंगला गौरी शक्ति पीठ देश के मशहूर शक्तिपीठों में से एक है। यहां पूजा-पाठ करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। उन्होंने बताया कि किसी भी व्यक्ति या जीव के लिए जन्म, पालन और संहार तीनों चीजें मायने रखती हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां पूजा करने वाले किसी भी भक्त को मां मंगला खाली हाथ नहीं भेजती है। मां मंगला गौरी शक्तिपीठ मंदिर में देवी सती का वक्षस्थल गिरा था, इसलिए इसे पालन पीठ भी कहा जाता