नारी डेस्क: भारत में सौंदर्य को अक्सर गोरी त्वचा से जोड़ा जाता है। शहनाज हुसैन, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध सौंदर्य विशेषज्ञ और “हर्बल क्वीन” के नाम से जानी जाती हैं, ने इस मिथक और इसके पीछे की सामाजिक, मानसिक और ऐतिहासिक वजहों पर खुलकर बात की।
भारतीय समाज में गोरी रंगत की चाहत क्यों?
शहनाज हुसैन के अनुसार, भारतीय समाज में गोरी त्वचा को सौंदर्य का मानक माना जाता रहा है। यह फैशन या मार्केटिंग का नया ट्रेंड नहीं है। विभिन्न देशों में सौंदर्य के अलग-अलग मानक होते हैं और भारत में गोरी त्वचा वाली महिलाओं को सुंदर माना जाता है। शहनाज का मानना है कि भारत में रंगत का यह सोच शायद इतिहास, संस्कृति और सामाजिक मानसिकता से जुड़ी है। कई लोगों का कहना है कि ब्रिटिश राज के दौरान गोरी रंगत को श्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति ने भारतीयों के मानसिकता पर असर डाला। इसके अलावा, विज्ञापनों में अक्सर गोरी त्वचा वाले मॉडल या कलाकार को ही दिखाया जाता है, जिससे यह धारणा और मजबूत होती है।

क्या सुंदरता केवल रंग पर निर्भर है?
शहनाज हुसैन कहती हैं कि त्वचा की सुंदरता का असली आधार स्वास्थ्य और त्वचा की देखभाल है, न कि रंगत। सांवली त्वचा वाली महिलाएं भी गोरी त्वचा वाली महिलाओं के बराबर या कई बार उनसे अधिक सुंदर और आकर्षक दिख सकती हैं। त्वचा की रंगत को लेकर विज्ञापनों में हो रहे पूर्वाग्रह को बदलने का समय आ गया है। यदि स्वस्थ, चमकदार और पोषित त्वचा हो तो रंग कोई मायने नहीं रखता। उन्होंने जोर देकर कहा कि गोरे रंग को श्रेष्ठ दिखाने वाले विज्ञापन बंद किए जाने चाहिए, और समाज में सुंदरता की धारणा में बदलाव जरूरी है।
इनर ब्यूटी यानी आंतरिक सुंदरता क्या है?
शहनाज का कहना है कि सुंदरता केवल बाहरी नहीं होती, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक सुंदरता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। आंतरिक सुंदरता शरीर, मन और आत्मा के संतुलन में निहित होती है। प्राचीन भारतीय ऋषियों ने योग, प्राणायाम और ध्यान को आंतरिक सुंदरता और मानसिक शांति के लिए जरूरी माना। योग और ध्यान से मानसिक तनाव कम होता है, स्वास्थ्य में सुधार होता है और आंतरिक सुंदरता विकसित होती है। शहनाज कहती हैं, “शांतचित्त और धीरज हमारे अंदर पहले से मौजूद हैं, बस हमें उनकी पहचान करनी है।”
हीन भावना को कैसे दूर किया जाए?
शहनाज हुसैन मानती हैं कि गोरी त्वचा की तुलना में काली या सांवली त्वचा वालों में हीन भावना समाज और परिवार की सोच से पैदा होती है। इसका इलाज केवल मानसिक और सामाजिक दृष्टिकोण में बदलाव से संभव है। माता-पिता को बच्चों की रंगत को महत्व नहीं देना चाहिए। इसके बजाय बच्चों के गुण, प्रतिभा और क्षमताओं को विकसित करने पर ध्यान देना चाहिए। संगीत, खेल, कला और शिक्षा के माध्यम से बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ाया जा सकता है। जब बच्चों में आत्मविश्वास आएगा, तो त्वचा की रंगत की अहमियत अपने आप कम हो जाएगी।

पूर्वाग्रह की शुरुआत और उसका समाधान
सांवली त्वचा के प्रति पूर्वाग्रह अक्सर घर से शुरू होता है। शहनाज कहती हैं कि यह बदलाव घर से शुरू होना चाहिए, और आगे नैतिक शिक्षा में इसे शामिल करना चाहिए। माता-पिता को फेयरनेस क्रीम या ब्लीच जैसी रसायनिक चीज़ों के उपयोग से रोकना चाहिए, क्योंकि ये त्वचा को नुकसान पहुंचा सकती हैं। बच्चों की रंगत के बजाय उनकी सुरक्षा, स्वास्थ्य और व्यक्तित्व के विकास पर ध्यान दिया जाना चाहिए। विज्ञापनों में भी बदलाव की आवश्यकता है। विज्ञापनों में सांवली त्वचा वाले लोगों को उदास या दुखी दिखाना बंद किया जाना चाहिए। शहनाज का मानना है कि सौंदर्य का पैमाना त्वचा की रंगत नहीं, बल्कि आंतरिक आत्मा, व्यक्तित्व और समाज में व्यवहार होना चाहिए।
शहनाज हुसैन की सीख
सुंदरता का असली आधार स्वास्थ्य और आंतरिक आत्मा है।
गोरी रंगत को श्रेष्ठ दिखाने वाले विज्ञापन समाज में नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।
बच्चों में हीन भावना न आने देने के लिए घर और स्कूल दोनों जगह सोच में बदलाव जरूरी है।
योग, प्राणायाम और ध्यान से मानसिक और आंतरिक सुंदरता विकसित होती है।
त्वचा की देखभाल और पोषण से रंगत का असर कम महत्वपूर्ण हो जाता है।
शहनाज हुसैन की यह राय हमें याद दिलाती है कि सौंदर्य केवल बाहरी नहीं बल्कि समग्र होना चाहिए, और आंतरिक सुंदरता ही वास्तविक आकर्षण का मूल है।